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ग्वालियर में कुपोषण से मासूमों की मौत

मप्र.सरकार के दावे खोखले होते जा रहे हैं


महानगर कहलाने वाले ग्वालियर में 100 परिवारों की बस्ती की हकीकत की तस्वीर जितनी सिहरन पैदा करती है उतने ही सवाल सिस्टम पर खड़े होते हैं. ग्वालियर-मुरैना लिंक रोड पर हजीरा थाने के बगल से लगी आदिवासी बस्ती में भूख, बेकारी और सरकार की योजनाओं से कोसों दूर यहां हर परिवार पानी तक पीने के लिए मोहताज है. पिछले तीन माह में कुपोषण से दो बच्चों की मौत ,अब 24 घंटे के भीतर दो और बच्चों में कुपोषण सामने आने के बाद यह साबित होता है कि वाकई सिस्टम ही कुपोषण का शिकार हो गया है. नईदुनिया की टीम ने रविवार को इस आदिवासी गांव में घर-घर जाकर पड़ताल की, जिसमें यही सच सामने आया .

बत्तर हालात पहले राधिका-विवेक,अब वंश और नीतेश भी कुपोषित -

मार्च 2018 - देवानंद आदिवासी की 4 साल की बेटी राधिका की मार्च के महीने में मौत हो गई थी. परिवार का कहना है कि गरीबी के कारण पूरे घर का पेट पालना मुश्किल था और कुपोषण के कारण उसकी मौत हो गई. विभाग ने इस मौत को कुपोषण से होना नहीं माना है.

अप्रैल 2018 - लल्लन आदिवासी के पौने पांच साल के बेटे विवेक की 23 अप्रैल को मौत हो गई थी. लल्लन ने बताया कि विवेक की मौत कुपोषण से हुई थी. विभाग इसकी मौत कुपोषण नहीं बल्कि टीबी से होना मान रहा है.

मई 2018 - नरेंद्र आदिवासी का 10 माह का बेटा वंश जन्म के बाद से ही गंभीर कुपोषित की श्रेणी में है,डेढ़ माह पहले विभाग ने वंश का इलाज कराने की सलाह परिवार को देने का दावा किया है और शनिवार को भी विभाग की टीम पहुंची थी.

मई 2018 - मुन्ना आदिवासी का 13 माह के बेटे नीतेश में रविवार को कुपोषण ट्रैक हुआ,उसका वजन 6 किलो 350 ग्राम निकला है जिसके सीएमएचओ मृदृल सक्सेना ने एनआरसी सेंटर में भर्ती कराया.

300 से ज्यादा कुपोषित क्यों -

 

अधिकारियों के दावों के बीच कुपोषण के आंकड़े छिपाए नहीं जा सकते हैं. सबकुछ ठीक है और सब मेहनत कर रहे हैं तो जिले में 1900 बच्चों के अतिकम वजन का आंकड़ा क्यों है. इन 1900 बच्चों में से 300 से ज्यादा कुपोषित क्यों हैं. यह आंकड़े आंगनबाड़ी से लेकर भोपाल तक बैठे वरिष्ठ अधिकारियों को आइना दिखाने के लिए काफी हैं.

मई में सेंटर में 28 बच्चे: हालत ठीक कहां -

एनआरसी सेंटर की प्रभारी डॉ. मोनिका यादव ने बताया कि मई माह में 28 बच्चे एनआरसी सेंटर में आए हैं,कुपोषण की श्रेणी में इन्हें रखा गया है. संख्या इसलिए ज्यादा कि गर्मी का सीजन है. इन बच्चों को 14 दिन की केयर दी जाती है और जरूरत और पड़ती है तो समय बढ़ा दिया जाता है. आदिवासी बस्ती में सीएमएचओ की उपस्थिति में तबीयत बिगड़ने पर राधा, समता, प्रेमाबाई, पार्वती और बच्चों में रोहित को इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया. बुखार व अन्य परेशानी के कारण इन्हें भेजा गया.


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