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Sunday 3rd of September 2017 | Political times

हैक एंड डिस्ट्रॉय


वर्तमान सरकार का ध्यान जनहित के मुद्दों और विकास से ज्यादा दो प्रमुख चीजों पर है, पहला इस लोकतांत्रिक प्रणाली में मजबूत स्तंभ को हैक करने का और दूसरा कमजोर पक्ष को जो कभी सरकार के खिलाफ खड़े हो सकते हैं, जो भविष्य में मजबूत हो सकते हैं उन्हें डिस्ट्रॉय (खत्म) करने का. वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था इसी दिशा में आगे बढ़ रही है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता प्रमुख स्तंभ प्रशासन, मीडिया व अन्य वह सभी तंत्र जो मजबूत थे उन्हें किसी भी प्रकार (PPP) पैसा, पावर, पॉलिटिक्स इन सब के माध्यम से हैक करने की कोशिश की गई है और सफल भी हुए हैं. इस देश के लोगों को बिहार में सिलसिलेवार सीबीआई के छापों से तकलीफ नहीं है यहां तकलीफ है मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले में हुई सिलसिलेवार मौतों के बाद अब तक क्या हुआ इसका जवाब क्या ? छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री ने दान की जमीन हड़पने का मामला सामने आया उसपर क्या हुआ? देशभर में छापे पड़े उसका परिणाम भी दिखे लेकिन कार्रवाई कभी एक पक्षीय ना हो ऐसी जनता की सरकार से अपेक्षा है लेकिन हो कुछ और ही रहा है और सब कुछ सामने है. सरकारी तंत्र का इस्तेमाल किसी को कमजोर करने के साथ-साथ सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वालों के ऊपर ज्यादा हो रहा है.

डिस्ट्रॉय पॉलिसी- वर्तमान सरकार द्वारा एक नए तरीके के लोकतंत्र का सृजन किया जा रहा है और यह नवाचार है विपक्ष को कमजोर करो, तोड़ दो ताकि सदन में आवाज दब सके, जो बचे और बिके उसे खरीद लो अपने पक्ष में कर लो ताकि विपक्ष कमजोर हो सके नष्ट हो सके. किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक समय ऐसा भी था जब कमजोर विपक्ष की स्थिति में सत्ता पक्ष कुछ ऐसे लोगों को हारने के बावजूद राज्यसभा के माध्यम से सदन में लाकर बैठाता था ताकि देश विदेश के मुद्दों पर एक सार्थक बहस हो सके क्योंकि एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान मजबूत विपक्ष से ही संभव है लेकिन आज की स्थिति या कुछ और है आज विपक्ष कुचला जा रहा है जोड़ तोड़ की राजनीति होता जा रहा है और सत्ता विपक्ष को खत्म करने पर आमदा है. ऐसा नहीं है कि इस पहलू पर पूरी तरह से ही सत्ता हावी है या सत्ता जिम्मेदार है इसमें एक जिम्मेदारी विपक्ष की भी है क्योंकि विपक्ष एकजुट नहीं है उसने सत्ता को हमला करने के अवसर दिए लंबे समय तक राजनैतिक सियासत में रहने के बाद आज विपक्ष में बैठने असहज महसूस कर रहे हैं. विपक्ष की जिम्मेदारी जमीनी स्तर के मुद्दों की लड़ाई सदन में लड़ने की है हां यह कह सकते हैं कि एक स्वस्थ लोकतंत्र को जनता के साथ सड़क पर बैठकर सरकार पर दबाव बनाते हुए उसे मजबूर करना ताकि जनहित में फैसले हो सके सिर्फ सरकार पर आरोप लगा देने मात्र से सरकार आपकी बात नहीं सुन सकती. आज सत्ता बहुत बड़ी जनमत के साथ आई है लेकिन उनके कमजोर फैसलों पर आपका उनसे भी कमजोर रवैया जनता को हतोत्साहित करता है वर्तमान व्यवस्था को देखते हुए सत्ता के विपक्ष में जनता की नजर में कोई खड़ा दिखता ही नहीं.

धीरे-धीरे करके विपक्ष का टूटना, कमजोर होना लोकतंत्र के लिए हानिकारक किसी सरकार के चुनाव में जनता निर्णायक तो है लेकिन जनता के मुद्दों को सरकार के कानों तक ले कर जाने की भूमिका हमेशा से विपक्ष करें लेकिन बिखराव की ऐसी स्थिति में गरीब, किसान, युवा और समाज के अन्य विभिन्न वर्गों की समस्याएं यूं ही रह जाएंगी. विपक्ष की नैतिक जिम्मेदारी प्रमुख मुद्दों को उठाने के बाद समय दर समय उसके फॉलोअप लेने की भी होती है लेकिन आज ऐसा नहीं हो रहा है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता चुनाव के बाद भी पेड न्यूज समाचार पत्रों, टीवी चैनलों यहां तक कि वेब मीडिया में भी बखूबी प्रसारित हो रहे हैं. भविष्य में ऐसी क्रियाओं की प्रतिक्रिया इस देश को किसी और दिशा की ओर ले जाने का काम करेंगी इसलिए मीडिया और विपक्ष को एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जागरुक होते हुए जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता से रखते हुए सरकार को फैसले लेने के लिए मजबूर करना होगा. वर्तमान में बहुत बड़ी बड़ी घटनाएं घटने के बाद भी सरकार किसी भी तरह के दबाव में नहीं आती जिसका सिर्फ एक ही कारण है विपक्ष का कमजोर होना और मीडिया का एक पक्षीय होना.


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