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मध्यप्रदेश में चुनावी बिगुल

इधर फैसले में देरी और उधर चुनावी शंखनाद हो गया


समय अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है मध्य प्रदेश में वर्तमान बीजेपी सरकार ने भी कमर कस ली है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तीन दिवसीय प्रवास पर भोपाल आए मैराथन कार्यकर्ताओं की बैठक, जिला, मंडल, IT सेल और कई अन्य प्रकोष्ठ सधी हुई बैठक लेकर भविष्य की गाइड लाइन भी देकर गए और घोषणा करके भी गए की आगामी विधानसभा चुनाव शिवराज सिंह के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा. राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा नरोत्तम मिश्रा के आवास में भोज के बाद मीडिया कर्मियों से साफ-साफ कहना कि आगामी चुनाव मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में लड़ा जाएगा इसके दो पक्ष है पहला केंद्रीय नेतृत्व को पता है कि भले सरकार पर गंभीर आरोप लगे हैं लेकिन प्रदेश स्तर पर शिवराज सिंह की छवि या पहुंच वाला प्रदेश में कोई अन्य नेता नहीं है एवं शिवराज सिंह का विरोध पार्टी में भी कोई खुलकर नहीं करता अप्रत्यक्ष रुप से कैलाश विजयवर्गीय खेमा या कुछ अन्य बड़े नेता सिर्फ अप्रत्यक्ष रूप से ही शिवराज सिंह के खिलाफ मन में कोई बात पाल कर रखेंगे सामने कोई नहीं आना चाहता. दूसरा पक्ष अमित शाह को बखूबी पता है कि विपक्ष कमजोर है सरकार जिस मोर्चे पर फेल होती है उस पर भी विपक्ष कुछ नहीं कर पाता, सरकार जिन मुद्दों पर विधानसभा में घेरी जानी चाहिए विपक्ष उन्हें भी सदन में नहीं भुना पाता. विपक्ष की गतिविधियों को देखकर केंद्रीय नेतृत्व आश्वस्त है कि अगली बार भी सरकार बनाने में कोई कठिनाई नहीं होगी इसलिए पुरानी चेहरे के साथ ही मैदान में उतरा जाए क्योंकि अगर विपक्ष मजबूत होता सरकार की नाकामियों को बड़े स्तर पर जनता के समक्ष ले आता तब सरकार चौतरफा घिरती और केंद्रीय नेतृत्व को किसी नए चेहरे की जरूरत पड़ती है, इसलिए यह कहा जा सकता है की विपक्ष की नाकामी के कारण कोई बड़ा फैसला लेने की नौबत नहीं आई.

पिछले दिनों मंदसौर गोलीकांड के बाद लगा था कि विधानसभा में सरकार को विपक्ष के तीखे प्रहारों का सामना करना पड़ेगा शायद नौबत इस्तीफे तक आ जाए लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ सरकार ने एक सधी हुई योजना के अंतर्गत विपक्ष को सदन में गुमराह करते हुए मंदसौर के रास्ते नरोत्तम मिश्रा के पेड न्यूज़ मामले से होते हुए नर्मदा घाटी से विस्थापितों की लड़ाई की ओर मोड़ दिया और ऐसा करते हुए सरकार विपक्ष के हमलों से बच गई. फिलहाल तो मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी टकटकी लगाए केंद्रीय नेतृत्व को देख रही है की कब किसे कमान मिलेगी लेकिन इस बात से मन ही मन कांग्रेसी भी इनकार नहीं कर रहे होंगे की जमीनी स्तर पर जो कार्यकर्त्ता हैं वो एक बड़े पुराने नेता से आज भी जुड़े हुए हैं अब देखना यह होगा की कब आलाकमान निर्णय लेता है और कब उर्जा का नया संचार होता है.

आज का समय और गतिविधियाँ यही दर्शा रहीं की बीजेपी इलेक्शन मोड में है और कांग्रेस हमेशा की तरह वेटिंग मोड में . बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने तो अपने दौरे के बाद एक तरह से चुनावी शंखनाद ही कर दिया है.


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