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Monday 2nd of October 2017 | गाँधी क्यों हैं राष्ट्रपिता ?

'व्यक्ति अपने विचारों से निर्मित प्राणीं है, वह जो सोचता है वही बन जाता है'


गाँधी क्यों हैं राष्ट्रपिता ?

आज लोगों की सोच क्या हो गई है, लोग क्या सोचते है और क्या बन रहे है । शायद हर व्यक्ति को कुछ भी सोचने से पहले ये जरुर सोचना चाहिए कि वो जो सोच रहा है, उस सोच से इसके भीतर किस तरह के विचारों कि उत्पत्ति होगी और उत्पन्न हुआ वो विचार उसे क्या बना रहा है । महात्मा गांधी का यह विचार 'व्यक्ति अपने विचारों से निर्मित प्राणीं है, वह जो सोचता है वही बन जाता है'  महात्मा गांधी ने यह बात बहुत पहले ही बोल दिया था । शायद वो समझ गए थे कि, जिस देश में  इतने महान विचारकों ने जन्म लिया उस देश के लोगों की सोचने की झमता ही खत्म हो जाएगी। गांधी के विचार विश्व के लिए इसलिए भी प्रासंगिक हैं कि उन विचारों को उन्होंने स्वयं अपने आचरण में ढालकर सिद्ध किया है । उन विचारों को सत्य और अहिंसा की कसौटी पर जांचा-परखा है । 1920 का असहयोग आंदोलन जब जोरों पर था उस दौरान चौरी-चौरा में भीड़ ने आक्रोश में एक पुलिस थाने को आग के हवाले कर दिया था। इस हिंसक घटना में 22 सिपाही जिंदा जल गए थे। इल घटना के बाद गांधी जी द्रवित हो उठे थे । उन्होंने तत्काल आंदोलन को स्थगित कर दिया था। जिसके बाद उनकी खूब आलोचना हुई लेकिन वे अपने इरादे से टस से मस नहीं हुए। वे हिंसा को एक क्षण के लिए भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे। ये उनके विचार ही तो थे ।
उनकी दृढ़ता कमाल की थी। जब उन्होंने महसूस किया कि ब्रिटिश सरकार अपने वादे के मुताबिक भारत को आजादी देने में आनाकानी कर रही है तो उन्होंने भारतीयों को टैक्स देने के बजाए जेल जाने का आह्नान किया। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन चलाया। ब्रिटिश सरकार द्वारा नमक पर टैक्स लगाए जाने के विरोध में दांडी यात्रा की और समुद्र तट पर नमक बनाया। उनकी दृढ़ता को देखते हुए उनके निधन पर अर्नोल्ड टोनी बी ने अपने लेख में उन्हें पैगंबर कहा। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन का यह कथन लोगों के जुबान पर है कि आने वाले समय में लोगों को सहज विश्वास नहीं होगा कि हांड़-मांस का एक ऐसा जीव था जिसने अहिंसा को अपना हथियार बनाया। हिंसा भरे वैश्विक माहौल में गांधी के विचारों की ग्राहयता बढ़ती जा रही है। जिन अंग्रेजों ने विश्व के चतुर्दिक हिस्सों में युनियन जैक को लहराया और भारत में गांधी की अहिंसा को चुनौती दी, आज वे भी गांधी के अहिंसात्मक आचरण को अपनाने की बात कर रहे हैं। ये सब किसके बल पर हो रहा था, ये एक विचार था अडिग और देश के लिए कुछ करने का विचार ही था जिसने मोहनदास करम चंद गांधी को महात्मा गांधी बनाया। 
विश्व का पुलिसमैन कहा जाने वाला अमेरिका जो अपनी धौंस-पट्टी से विश्व समुदाय को आतंकित करता था अब उसे भी लगने लगा है कि गांधी की विचारधारा की राह पकडक़र ही विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है। सच तो यह है कि गांधी के शाश्वत मूल्यों की प्रासंगिकता बढ़ी है। गांधी अहिंसा के न केवल प्रतीक भर हैं बल्कि मापदण्ड भी हैं जिन्हें जीवन में उतारने की कोशिश हो रही है। अभी गत वर्ष पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ह्वाइट हाउस में अफ्रीकी महाद्वीप के 50 देशों के युवा नेताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि आज के बदलते परिवेश में युवाओं को गांधी जी से प्रेरणा लेने की जरुरत है। गत वर्ष पहले अमेरिका की प्रतिष्ठित टाइम पत्रिका ने महात्मा गांधी की अगुवाई वाले नमक सत्याग्रह को दुनिया के सर्वाधिक दस प्रभावशाली आंदोलनों में शुमार किया। याद होगा अभी कुछ साल पहले जाम्बिया के लोकसभा सचिवालय द्वारा विज्ञान भवन में संसदीय लोकतंत्र पर एक सेमिनार आयोजित किया गया जिसमें राष्ट्रमंडल देशों के लोकसभा अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों ने शिरकत की। जाम्बिया की नेशनल असेम्बली के अध्यक्ष असुमा के. म्वानामवाम्बवा ने इस सम्मेलन के दौरान गांधी के सिद्धान्तों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की और कहा कि भारत के साथ हम भी महात्मा गांधी की विरासत में साझेदार हैं। उन्होनें बताया कि अहिंसा के बारे में गांधी जी की शिक्षाओं ने जाम्बिया के स्वतंत्रता आन्दोलन को बेहद प्रभवित किया। सच तो यह है कि अब गांधी के वैचारिक विरोधियों को भी लगने लगा है कि गांधी के बारे में उनकी अवधारणा संकुचित थी। उन्हें विश्वास होने लगा है कि गांधी के नैतिक नियम पहले से कहीं और अधिक प्रासंगिक और प्रभावी हैं और उनका अनुपालन होना चाहिए। लेकिन इतने महना विचारों से उस देश के हि लोग इतने दूर है जिस देश को विश्वपटल में संती का दूतक माना गया है। आज लोगों में इतना गुस्सा है कि छोटी सी बात में लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते है। ये कौन सी विचारधारा है। ये तो हमे विरासत में नहीं मिली थी। गांधी जी राजनीतिक आजादी के साथ सामाजिक-आर्थिक आजादी के लिए भी चिंतित थे। समावेशी समाज की संरचना को कैसे मजबूत आधार दिया जाए उसके लिए उनका अपना स्वतंत्र चिंतन था। उन्होंने कहा कि जब तक समाज में विषमता रहेगी, हिंसा भी रहेगी। हिंसा को खत्म करने के लिए विषमता मिटाना जरुरी है। विषमता के कारण समृद्ध अपनी समृद्धि और गरीब अपनी गरीबी में मारा जाएगा। इसलिए ऐसा स्वराज हासिल करना होगा, जिसमें अमीर-गरीब के बीच खाई न हो।
आज गाँधी के विचारों का अनुशरण पूरा विश्व कर रहा है । गाँधी के बताये रास्तों पर ऐसे देश आकर खड़े हुए हैं जो कभी हिंसा के रास्ते अमन की तलाश में थे । सोचने का विषय यह भी है की आखिर क्यों उन्हें गाँधी के विचार सही लगे? इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण था की गाँधी के रास्ते परिपक्व हैं, विकास और सद्भाव की ओर अहिंसा के रास्ते ही बढ़ा जा सकता है। 


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