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Saturday 15th of September 2018 | देवर्ष की मौत का जिम्मेदार कौन

सवाल छोड़ गयी फंदे से उतरी देवर्ष की लाश


जब यह लिख रहा हूँ तब इस प्रतिभासंपन्न छात्र देवर्ष अजयपाल बागरी निकनेम 'देव' की देह सागर जिला चिकित्सालय की मर्च्युरी में चीरी फाड़ी जा रही होगी। डा. हरिसिंह गौर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के टैगौर हास्टल के कमरे में फाँसी के फंदे से उतार कर उसके एक दर्जन साथी छात्र अस्पताल लाए थे। शाम पांच बजे का वक्त था। बदहवास बच्चों को लगा देव की सांस चल रही है तो मोटरसाइकिल पर ही जैसे तैसे लादकर अस्पताल की ओर भागे। उतार कर स्ट्रेचर पर लादा ,बीएमसी के प्रशिक्षु डाक्टर ने कारण पूछा और कहा कि पर्ची बनवाइए। परिस्थितियों को डाक्टर ने भले ही ज्यादा ठीक भांपा हो लेकिन छात्रों को लगा कि जाते ही इलाज शुरु हो जाना चाहिए, यही कोर्ट और सरकार के नियम भी कहते हैं। ' पहले पर्ची या उपचार ' इस शाश्वत मुद्दे पर ट्रेनी डाक्टर का हास्टलर्स से झगड़ा हुआ। उसने मेडीकल कालेज से अपने हास्टलर बुलाए। पता नहीं देव तब तक मर चुका था या नहीं , उसकी देह अपने साथियों को डाक्टरों से पिटते देखते रही।

देव के मरने और छात्रों के बुरी तरह पीटे जाने की खबर एक साथ विश्वविद्यालय के हास्टलों तक पहुंची। शाम के कुहाँसे में सैकड़ों की तादाद में विवि की पहाडियों से उतर कर मेडीकल कालेज का हास्टल घेर लिया। जंगल से तोड़े गए डंडे भी बहुतों के हाथों में थे। मेडीकल कालेज के लड़कों की हर मूर्खता को सुरक्षा देने प्रशासन जैसे बाध्य ही रहता है। पूरे थानों के पुलिस बल ने छात्रों से मोर्चा लिया। अश्रुगैस और लाठीचार्ज से चालीस पचास छात्र और पीटे गए, घायल हुए और जिला अस्पताल में ही उन्हें भर्ती होना पड़ा।

बदहवासी, त्वरित आक्रोश, युवावस्था की विवेकहीन ऊर्जा ने जो मंजर तैयार किया उससे आज के अखबार रंगे पड़े हैं। मेडीकल कालेज के डीन को चाहिए कि अस्पताल में ड्यूटी पर भेजे जाने के पहले वह मेडीकल स्टूडेंट्स को समाज के विभिन्न अवयवों से डील करने और ट्रामा से जुड़े बेसिक कानूनी नुक्तों की ट्रेनिंग देकर ही भेजे। आपके ये ट्रेनी बहुत बार उपचार के बजाए बीमारी बांट देते हैं।

सवालों में लिपटी देवर्ष की लाश ज्यादा बड़े जवाबों की प्रतीक्षा में है। सतना के नागौद से सागर विवि आया देवर्ष रीवा सैनिक स्कूल से निकला अनुशासित ,परफेक्शन का मुरीद और अपने कैरियर के लिए लक्षित छात्र था। सोशल मीडिया उसकी पढ़ाई पर हावी नहीं हो सका था। फेसबुक अकाऊंट पर महीनों से खामोश था। गणतंत्र दिवस की परेड का कमांडर रह चुका एनसीसी का शानदार कैडेट। उसकी फेसबुक प्रोफाइल में दूर दूर तक इश्क प्यार लड़की जैसी हलकटयाइयों का जिक्र नहीं है। देशभक्ति की चंद पोस्टें, अब्दुल कलाम की फोटो। शिक्षकों की तारीफ और प्रमाणपत्र लेती तस्वीरें हैं। आत्महत्या की प्रवृति का कोई पैटर्न उसके फेसबुक खाते से पता नहीं चलता। फिर क्या हुआ था जिसने उसको फाँसी के फंदे तक पहुंचा दिया।...यह था सागर के डा. हरिसिंह गौर सेंट्रल यूनिवर्सिटी का सिस्टम और दुर्भाग्य से यहां भी शिक्षकों के रूप में शोधछात्र यानि ट्रेनी टीचर उसकी किस्मत लिख रहे थे।

देवर्ष बीएससी सैकिंड इयर का छात्र था। हर विषय में मिड सेशन एग्जाम के कई सत्र अध्ययन के दौरान होते हैं। बहुधा शिक्षकों की गुडविल पर निर्भर होता है कि इन परीक्षाओं में किसे कितने अंक मिलेंगे। फेल किसी को नहीं किया जाता। मिड का कोई पृथक परीक्षा शैड्यूल नहीं होता। कुछ दिन पूर्व छात्रों को बता कर क्लासरूम के सब्जेक्ट पीरियड में ही यह परीक्षा ले ली जाती है। विवि प्रशासन के एग्जाम शेड्यूल के हिसाब से सभी विभागों को आदेश था कि 18 सितंबर तक सभी विभाग अपने मिड संपन्न करा लें। हरेक विभाग की तरह गणित विभाग में भी हड़बौंग थी कि मिड निपटाए जाएं। सभी शिक्षकों ने एक ही दिन में चार विषयों की परीक्षा रख दी। देवर्ष ने विरोध किया कि एक एक दिन का समय दीजिए पढ़ने को। इससे नाराज एक रिसर्च स्कालर टीचर ने परीक्षा लेते समय देवर्ष की कापी यह कहते हुए छीन ली कि वह मोबाइल जेब में रख कर क्यों आ गया परीक्षा में।...देवर्ष को चाहिए था वह मिड्स में पढ़ाई के बजाए टीचर्स की गुडविल का सहारा लेता। इसमें सभी की सहूलियत होती। विश्वविद्यालयों में आजकल यही निजाम है कि सहूलियत को पढ़ाई पर तरजीह दी जाए।...लेकिन देवर्ष पढ़ कर परीक्षा देना चाहता था। तो उस पर नकल के मकसद से मोबाइल रखने का आरोप लगा और कापी छीन ली गई। रीवा सैनिक स्कूल से निकले अनुशासित कैडेट के लिए यह अपमान अपने जीवन से भी बड़ा प्रतीत हुआ होगा। लिहाजा वह हास्टल में अपने रूम पर लौटा और उसने जीवन त्याग दिया...अपमान नहीं सहा।

 पुलिस ने उसका कमरा टैगोर हास्टल रूम नंबर 38 सील कर दिया है। वहां देवर्ष के कपड़े , किताबें , यादें होंंगी, वे सब अभी पुलिस के पास रहेंगी। मर्ग कायम है ,उसमें खात्मा भी तो लगाना है। एक होनहार छात्र की जिंदगी पर खात्मा तो कल ही लग चुका था।

सोशल मीडिया से प्राप्त कंटेंट है लेकिन आज देवर्ष कई सवाल छोड़ गए हैं.

लेखक- रजनीश

 


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