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छात्र राजनीति का विरोध क्यों -

छात्र राजनीति का विरोध क्यों


जो खुद छात्र राजनीति से आये हैं वो आज छात्र राजनीति के खिलाफ क्यों खड़े हो रहे हैं. भारत में राजनीति के बड़े चेहरे छात्र राजनीति से ही आये हैं सब ने छात्र राजनीति के दौरान राजनीति की बारिकियों को सीखा और फिर एक लम्बी राजनैतिक पारी खेली . छात्र राजनीति ने हमेशा प्रदेश और केंद्र की राजनीति में हस्तक्षेप किया है . शिक्षा व्यवस्था की लड़ाई, छात्र हितों की बात एवं सत्ता को छात्र हित युवा हित के लिए मजबूर करना यह सब छात्रसंघ द्वारा ही संभव होता रहा है.

पिछले कुछ सालों में छात्र राजनीति से सरकार को कुछ तकलीफे भी है, सरकारें चाहती हैं की जिस राज्य में हमारी सरकार हो वहां के विवि. और यूनिवर्सिटी में भी हमारे ही संगठन हो और जब ऐसा संभव न हो पाए तो वहां इस प्रक्रिया को समाप्त किया जाए और ऐसा सोचना उन मंत्रियों और नेताओं का है जो खुद छात्र राजनीति से आये हैं. सरकारें छात्र संघ के चुनाव की प्रक्रिया को कुछ ऐसा बना रही हैं जिससे चुनाव और निर्वाचन और अधिकार नाम मात्र का रह जाए. बात जब छात्रों के राजनीति की है तो फिर क्यों क्वालिफिकेशन वाला मामला आता है अगर क्वालिफिकेशन वाला मामला है तो फिर सरकार चुनने मे भी क्वालिफिकेशन होना चाहिए.

छात्र राजनीति का असर केंद्र और राज्य सरकारों पर साफ़ तौर पर देखा जा सकता है बात चाहे जेएनयू की हो या बीएचयू की हमेशा से छात्र राजनीति ने सरकारों को कई बार छात्र हित में छात्रों की मांगों को लेकर झुकना पड़ा है.

प्रदेश में स्थापित सरकारें इस बात को लेकर भी चिंतित रहती हैं की छात्र राजनीति से मुख्य राजनीति में आने वाला युवा विरोध की एक अलग संस्कृति का सृजन करता है तर्कपूर्ण तथ्य के सामने सरकारों के पास जवाब नहीं होता इसलिए छात्र राजनीति को समाप्त करना सरकारों के लिए सेफ साइड गेम होता है.

देश के दिग्गज नेताओं ने छात्र राजनीति के सहारे राज्य और केंद्र की मजबूत राजनीति की है और वैश्विक पटल पर एक अलग कीर्तिमान बनाया है लेकिन वर्तमान व्यवस्था छात्र राजनीति को समाप्त करना चाहती है.


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