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Friday 1st of March 2019 | न थोपे जायें प्रत्याशी जनता पर:अमित मिश्रा

जनता को बड़ी उम्मीदें होती हैं जनप्रतिनिधि से, फिर चोर बनाम डाकू क्यों?


लोकसभा 2019 को लेकर सियासी दल कमर कस चुकें हैं. प्रत्याशी चयन से लेकर तमाम रणनीतियों पर मंथन चल रहा है. देश भर के संसदीय क्षेत्रों में बाढ़ सी आ गयी है. परम्परागत मतलब कॉपीराइट वाली सीटों को छोड़कर बांकी जगह प्रत्याशियों की बाढ़ आ गयी है. कोई पैसे के दम पर तो कोई भीड़ दिखाकर अपने आपको योग्य बता रहा है. वैसे वर्तमान राजनीति में पैसा एक बड़ा पैमाना है नेता बनने का. पुराने समय में जनता के मुद्दों की लड़ाई लड़ने वाले दावेदार हुआ करते थे अब ट्रेंड बदला है खरीद-फरोख्त करने वाले मजबूत दावेदार हैं. 2019 के रण में भी हर राजनैतिक दल वैचारिकी, सामाजिक अन्य पक्षों को छोड़कर सीधे तौर पर जिताऊ उम्मीदवार को खोज रहे हैं. यहाँ जिताऊ से मतलब हर हाल में जिताऊ उम्मीदवार ही चाहिए. माना की जीत सदन तक पहुचने के लिए जरुरी है लेकिन व्यक्तित्व भी तो महत्वपूर्ण है. किसे मैदान में उतार रहे हैं राजनैतिक दल यह भी देखना जरुरी है.

अब चुनावों का ट्रेंड बदल गया है जनसंपर्क, जनहित के मुद्दों से ज्यादा मैनेजमेंट और कूटनीति मैटर करती है. समाजवाद अब बस किताबों में अच्छा लगता है. 4 साल जनता को चिढाने वाले चुनावी साल में ऐसे पैर छूते हैं मानों जनता में उन्हें साक्षात प्रभू के दर्शन हो रहे हों. मेरा व्यक्तिगत ऐसा मानना है की अब फिर से एक बार जनता को कुछ चीजों को लेकर राजनैतिक दलों से सवाल करना चाहिए. जनता दलों से यह जानने की कोशिश करे की आखिर क्यों हमे हमारी मंशा के अनुरूप उम्मीदवार नहीं दिए जाते. घटिया और महाघटिया दो ही विकल्प क्यों, चोर और डकैत में ही क्यों चुनना है. क्रूर और महाक्रूर में चयन क्यों?

आज के समय में राजनैतिक दल सिर्फ प्रत्याशियों को थोप रहे हैं. टिकिट वितरण का पैमान सिर्फ जीत है ये समझ आता है लेकिन प्रत्याशियों का चाल, चत्रित, चेहरा नाम की भी कोई चीज होती है. राजनैतिक संवाद का क्षरण भारतीय राजनीति के लिए कदापि सही नहीं है. आज जनता को यह सोचने और समझने की जरुरत है की उन्हें कैसा जनप्रतिनिधि चाहिए.आज ऐसी परिस्थिति निर्मित होती जा रही है की हमारे पास ख़राब विकल्प होते हैं और हम सिर्फ ख़राब में कम ख़राब का चयन करते हैं.

अब धारणा को बदलने की जरुरत है.जनता को राजनैतिक दलों को मजबूर करने की जरुरत है जिससे राजनैतिक दल हमे चुनाव के लिए बेहतर विकल्प दे.थोपे हुए डमी प्रत्याशियों के कन्धों पर क्षेत्र की जिम्मेदारी कैसे सौपी जा सकती है.समाज के धरातल और विजन वाले जनप्रतिनिधियों को आगे बढ़ाने की जरूरत है.


जनता को बड़ी उम्मीदें होती हैं जनप्रतिनिधि से, फिर चोर बनाम डाकू क्यों?


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