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Saturday 2nd of March 2019 | एमपी अजब भी है और गजब भी...।

9वीं के बच्चों ने हल कर दिया 12 वीं का पेपर ?


 

अभी तक शिक्षा में बदनामी को लेकर बिहार ही चर्चित था...लेकिन अब मध्यप्रदेश बिहार को पटखनी देते हुए नजर आ रहे है। हर रोज एक नए कारनामे और कारनामों पर कारनामे भई! एमपी अजब भी है और गजब भी है...। कभी उत्तर प्रदेश और बिहार अपने गुणवत्ताहीन शिक्षा और नकल से परिपूर्ण परीक्षा कराने को लेकर वाहवाही बटोरा करता था। लेकिन मध्यप्रदेश इन दोनों राज्यों से कहीं चार कदम आगे है...और उनसे दस कदम आगे यहां के छात्र है। यानी ले देकर कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि बघेली की एक कहावत ‘जईसन गुरू ओइसय चेला’। क्योंकि प्रदेश में चालू हुए बोर्ड एग्जाम में हैरत अंगेज मामला सामने आया है प्रदेश के हरदा में तो कमाल ही हुआ है... और हुआ यह है कि नौंवी के छात्रों को बारहवीं का प्रश्न पत्र सौंप दिया गया...और 21 वीं सदी में बच्चे कहां बच्चों के बापों ने जन्म लिया हुआ है। जिन्होंने 12 वीं का प्रश्न पत्र बड़े ही आराम और शान से हल कर उत्तरपुस्तिका भी जमा कर दी...। छात्रों के इस अदम्य साहस को शाष्टांग दंडवत प्रणाम इसके लिए मध्यप्रदेश तो अजब प्रदेश हो गया लेकिन गजब क्यों हुआ यह भी जान लीजिए...क्योंकि जब कॅापी परीक्षा नियंत्रण कक्ष में निरीक्षकों द्वारा जमा की जा रही थी तो केंद्र पर्यवेक्षक के सामने माजरा खुला है और विद्यालय में तैनात शिक्षिका को बच्चों के घर भेजकर 12 वीं के प्रश्न पत्र वापस मंगवाएं गए। यह पूरा माजरा हरदा से 11 किमी दूर ग्राम पंचायत अबगांव कला में स्थित हाईस्कूल का है। जहां 28 फरवरी को कक्षा 9वीं के अंग्रेजी विषय का पेपर था, लेकिन शिक्षक 9वीं की जगह थाने से 12वीं के अंग्रेजी विषय का प्रश्न पत्र उठा ले आए और बच्चों में बांट दिया बच्चे भी आधुनिक शिक्षा ग्रहण करने वाले रोजाना सारे विषयों की कक्षाओं को लेने वाले...हर चीजों को समझने वाले तो उन्होंने 12 वीं के प्रश्न पत्र को भी हल करने में बिल्कुल भी नागवार नहीं समझा और अपने अत्यधिक ज्ञान का परिचय देते हुए प्रश्न पत्र में पूछे गए सवालों के जवाब को लिखा...लेकिन एक ही चीज मेरी समझ में नहीं आ रही कि इतनी बकलोली हो कैसे जा रही है...चलिए एक छात्र को प्रश्न पत्र दिया जाता तो बात समझ में आता है कि गलती हो गई लेकिन सारे बच्चों को वही प्रश्न पत्र समझ से बाहर अब यदि ठोड़ा इस पर विचार करें कि यह इतनी बड़ी गलती हुई कैसे क्या प्रश्न पत्र बांटने वालों ने प्रश्न पत्र का परिचय नहीं पढ़ा...क्या केंद्राध्यक्ष ने आंख बंद करके पेपर की सील खोली या फिर पेपर कराने वालों को यही नहीं मालूम था कि परीक्षा देने आए विद्यार्थी किस कक्षा के छात्र है...चलिए इन सब को यदि माफ भी कर दिया जाए तो सवाल उन परिक्षार्थियों से भी जिन्हें यह नहीं मालूम था कि वो किस कक्षा के छात्र है और किस कक्षा का प्रश्न पत्र सौंपा जा रहा है...क्या छात्रों को इसकी भनक तक नहीं लगी की यह प्रश्न पत्र ‘आउट ऑफ सेलेबस’, प्रश्न पत्र को पढ़ने के बाद क्या उनके दिमाग ने सवाल नहीं पूछा कि बेटा जो तुमने एक साल तमाम नौटंकियों के साथ कक्षा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है उस कालचक्र में इन मुद्दों पर बात तो हुई ही नहीं...जो हमें साल्व करने के लिए सौंप दिया गया है...नहीं! बिल्कुल नहीं! किसी के मन में कोई सवाल ही नहीं पनपा, किसी को नहीं लगा कि यह गलत हो रहा है, किसी को भी यह एहसास नहीं हुआ कि सभी ने मिलकर बहुत बड़ी गलती की है...। इस गलती को सुधारा जाए! और यह गलती शिक्षकों द्वारा एहसास कहां से की जाए, परिक्षार्थियों को यह लगे ही कहां से यह हमारा पेपर ही नहीं यह हमारे पाठ्यक्रम का सवाल ही नहीं है क्योंकि गुरु से छात्र दस कदम आगे ही होता है! जिसका नतीजा सामने है कि क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है? कहां हो रहा है? और कौन कर रहा है...लेकिन अभी सवाल इतने पर आकर नहीं रूकता मामले को ठोड़ा गंभीरता से लेते है तो पूरा चक्र बन कर सामने आते हुए एक सवाल उभरता है कि इसका दोषी कौन ? छात्र!, स्कूल!, शिक्षा का स्तर!, शिक्षा का पैमाना!, शिक्षा का मानक!, शिक्षक!, वातावरण! और इससे जुड़े लोग! यदि इन सारे सवालों के जवाब ढूंढे तो सामने सिर्फ एक ही चीज आता है जो आप सबको पता है...।



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