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Monday 4th of March 2019 | सत्ता और सत्ता का नशा

सत्ता के मद में मदहोश मंत्री, नशे और खैनी पर ही अटके : सौरभ त्रिपाठी


मध्यप्रदेश अपने आप में अद्भुत प्रदेश है। जहां खुद को जन नेता और समाज में व्याप्त बुराईयों को दूर करने के लिए क्रांतिकारी बताने वाले अपरिपक्व मंत्री कुछ भी कह देने से गुरेज नहीं खा रहे है। जिसका नतीजा है कि कमलनाथ सरकार के दो जिम्मेदार मंत्रियों ने एक जन नेता के रूप में अपनी मानसिकता तो दिखाई ही है साथ ही सरकार के सुशासन और बेहतर राज वाले अरमानों की मटिया पलित भी कर दी है। भारतीय राजनीति को मर्यादित और संस्कारिक राजनीति का मूरत माना जाता है। लेकिन मध्यप्रदेश सरकार के मंत्री और जिम्मेदार इस मूरत को अकारथ बनाने के दिशा में सतत आगे ही बढ़ते जा रहे है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस पार्टी को पंद्रह वर्षों बाद प्रदेश की बागडोर मिली है और इस बात को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि प्रदेश की कमान अनुभवी व जिम्मेदार व्यक्ति के हाथों सौंपी गई है लेकिन पंद्रह वर्षों बाद मिली बड़ी जीत के बाद प्रदेश सरकार ने कैबिनेट मंत्रियों का चयन गलत कर लिया है। अब पार्टी ने ऐसे लोगों को क्यों प्रदेश के जिम्मेदार और जवाबदार मंत्रालयों को जिम्मा सौंपा है यह तो राम ही जाने! लेकिन दो दिनों के भीतर सामने आए मंत्रियों के बयानों ने सरकार की नीति और नियत को स्पष्ट कर दिया है। जिसमें आम लोगों को ऐसा उम्मीद बिल्कुल नहीं होता है कि अपने आप को बड़े क्रांतिकारी नेता बताने वाले शुरवीर आम लोगों के बीच गलत चीजों को बढ़ाने की वकालत करें। लेकिन मंत्रियों का यह बयान इसे क्या कहे, क्यों कहे अब इस पर सवाल उठाना लाजमी नहीं है। क्योंकि आज कल राजनीति के क्षेत्र से दिनकर, लोहिया, जयप्रकाश, कर्पूरी ठाकुर, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे जननायकों के आदर्श गायब है। जबकि उनके स्थान पर दागदार, असभ्य व नासमझ परिवार नायकों ने वर्चस्व कायम कर लिया है। जिसका नतीजा है कि आज कल ऐरे गैरे भी जनहित और अन्य को दरकिनार कर सत्ता की पग घूंघरू कुर्सीयों पर अपना कब्जा जमा ले रहे है। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी बिना किसी प्रमाण के अपने रैलियों से प्रधानमंत्री को चोर का तमगा देकर राजनीति के सम्मानजनक रूप को दर्शा रहे है और उन्हीं के मंत्री आम लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने अपने आप को सबसे अच्छा जन नेता बताने के उछाह में कुछ भी बोल जाने को आतुर है। अब यह बात उनके लिए मायने नहीं रखती कि जिम्मेदारी का एहसास क्या है और ऐसे बयान देकर हम किस संस्कार और सभ्यता को फलीभूत कर रहे है...। जरा गौर फरमाए दो दिनों के घटनाक्रम को तो प्रदेश के मंत्रियों ने क्या कुछ कहा इसे जानकर, सुनकर और पढ़कर आप खुद हैरान हो जाएंगे और साथ ही इस बात का भी एहसास अवश्य जरूर होगा कि प्रदेश व देश को ठीक करने, सकरात्मक दिशा में आगे बढ़ाने के लिए जिनको जिम्मेदारी सौंपी गई है वें कितने गैरजिम्मेदार है जो कुछ भी बोल दे रहे है। नाथ सरकार में कैबिनेट व प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण विभाग का जिम्मा संभालने वाले खाद्य व वितरण मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर को ही ले लीजिए और उनके बयानों पर ठोड़ा विचार कीजिए, जिसमें प्रदेश के एक जिले में आयोजित कर्जमाफी योजना के तहत आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बोल गए कि सरकार उन बुजुर्गों के लिए 1000 रुपए पेंशन दे रही है जिन्हें बीड़ी फूंकने और तंबाकू चबाने की लत हो। अब स्वास्थय मंत्रालय करोड़ों इस बात पर सुलगा देती है कि धुम्रपान जानलेवा है और नशा स्वास्थय के लिए हानिकारक है। लेकिन खाद्य मंत्री इस वैधानिक चेतावनी को दरकिनार कर आम लोगों के बीच इस धारणा को तोड़ने की दिशा में काम करने की वाहवाही लूटने पर आमदा है...इनकों दाएं बाएं करें तो प्रदेश के और सबसे अहम विभाग उच्च शिक्षा विभाग और युवा खेल मंत्रालय का जिम्मा संभालने वाले युवा और खुद को होनहार कहने वाले मंत्री जीतू पटवारी ने तो हद्द ही कर दी। जब एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि सरकार ने कन्या विवाह राशि सिर्फ इसलिए बढ़ा दी है क्योंकि शादी विवाह में देशी और अंग्रेजी का इंतजाम किया जा सके। अब मंत्रियों को इस प्रकार की सोच को सलाम करे या झूंकी नजरों से उठा कर गिरा दें....हालांकि इनके बारे में लिखकर शब्दों के अस्तित्व को हम चुनौती दे रहे कि ऐसे कुठाराघात और दबी सोच वाले के बारे में इतना कुछ लिख रहे है। लेकिन सवाल यह उठ रहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे युवा और आधुनिक सोच वाले मंत्रि देश को आगे बढ़ाने के लिए क्या इस तरह की घटिया सोच के साथ आगे बढ़ेंगे या फिर इसी सोच, इसी दृष्टि और नियत के साथ आगे बढ़ाएंगे आगे भी इस पर विचार और प्रश्न वाला चिन्ह आगे भी जारी रहेगा।



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