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Wednesday 18th of October 2017 | कानों में विकास की गूंज के बीच मासूम की मौत

कानों में विकास की गूंज के बीच मासूम की मौत:अमित मिश्रा


झारखंड के सिमडेगा से एक खबर आई एक 11 साल की बच्ची भूख की वजह से मर गई जब इस खबर की तह तक जाने की मीडिया ने कोशिश की तो कई तरह के सवाल खड़े हुए कई तरह की चीजें निकल कर सामना आई| आधार कार्ड, कहीं गरीबी, मलेरिया, राशन, सरकार या दुर्गा पूजा की छुट्टी जैसी बातें सामने आई,आप सोच रहे होंगे कि इस विषय पर खबर तो बन चुकी मीडिया ने अपना पक्ष भी रख दिया लेकिन उसके बाद फिर इस पर चर्चा क्यों मैं आपको बता दूं हम आज भी 21वीं सदी के उस भारत में हैं जहाँ चंद रोटी के टुकड़े ना मिलने से हर रोज न जाने कितने बच्चे मरते हैं फर्क सिर्फ इतना है की हजारों मरने वालों में कुछ एक-दो ही खबरों में आ पाते इस घटना के बाद एक चीज सामने आई बच्ची की मौत के पीछे उसका 8 दिन का भूखा रहना सबसे बड़ी वजह थी| आज भी हमारे कानों से नेताओं की वह दहाड़ नहीं जाती जिसमें उन्होंने गरीबी, भुखमरी, बीमारी इन सबसे देश को आजाद करने की बात कही उस मासूम की मौत के बाद किसी ने मलेरिया का बहाना दिया किसी ने राशन कार्ड का बहाना दिया किसी ने आधार नंबर ना जुड़ने का बहाना दिया और फिर किसी ने स्कूल में दुर्गा पूजा की छुट्टी होने का साफ़ सुथरा बहाना बताया \ स्कूल बंद मतलब मध्यं बंद और भूख से मौत |बातें कितनी भी हो मौत एक मासूम की हुई|

पूरे देश में विकास की एक क्रांति की बात कही जा रही है सरकार ने अपनी बातों से यह साबित किया है कि विकास हो रहा है फिर इस मासूम की मौत का जिम्मेदार कौन है? विपक्ष कहां है? विपक्ष की अपनी एक अलग भूमिका है गरीब दबे कुचले लोगों की आवाज बनने का |

क्या सिर्फ राजनैतिक लड़ाईयों में पीसकर रह जाएंगी ऐसी मासूम जानें | आजादी के बाद हमारा सबसे पहला संकल्प कुपोषण से होने वाली मौतों को रोकना था गरीबी दूर करना था लेकिन हम आज जिस पायदान पर खड़े हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि गरीबी दूर हुई नहीं बल्कि गरीब और गरीब हुआ भूखा भुखमरी की ओर चला गया |

देश के प्रगति की बात तब तक सार्थक नहीं हो सकती जब तक हमारे देश का गरीब गरीबी,भुखमरी से निजात न पा ले|


जिस पत्रकारिता का कभी स्वर्णिम युग ना था , उसमे स्वर्णिम व्यक्तित्व की तरह उ

अटल जी के निधन से आहत हुआ देश !


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