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Sunday 16th of June 2019 | दिसंबर 2018 से अब तक कितना बदला रीवा

कांग्रेस की सरकार बनने के बाद रीवा के लिए क्या कार्ययोजना :अमित मिश्रा


विधानसभा चुनाव 2018 के बाद रीवा जिले को सबसे ज्यादा उम्मीद इस बात की थी कि पिछले 15 सालों में रीवा जिले ने जिन उपलब्धियों को हासिल किया है उसी कड़ी में और उपलब्धियां साथ जुड़ेंगी. 15 साल बाद सत्ता परिवर्तन हुआ मध्यप्रदेश में एक बार फिर से कांग्रेस की सरकार बनी, हालांकि स्पष्ट तौर पर कहा जाए तो कांग्रेस का पिछले 10 साल का कार्यकाल रीवा और प्रदेश के दृष्टिकोण से  ठीक नहीं माना जाता है. आम जनता के बीच में यह भावना बनी रही थी कि 10 सालों में जब कांग्रेस की सरकार थी रीवा और प्रदेश कुछ खास हासिल नहीं कर पाया ,जिसका परिणाम यह हुआ की जनता ने 15 साल के लिए कांग्रेस की सत्ता से बेदखली कर दी. अब 2018 में नई उम्मीदों के साथ एक बार फिर जनता ने कांग्रेस को चुना.विधानसभा चुनाव में विंध्य क्षेत्र में जरूर कांग्रेस पीछे रही लेकिन मध्य प्रदेश में सरकार बनाने में सफल रही. बात की जाए रीवा जिले की तो 15 सालों में बीजेपी के पास वह तमाम चीजें थी प्रचार-प्रसार करने के लिए और भारतीय जनता पार्टी ने स्पष्ट रूप से एक माहौल जरूर निर्मित किया कि सत्ता में कोई आए आपको जिले के विकास के लिए काम करना पड़ेगा. विन्ध्य में मिली करारी पराजय के बाद मंत्रिमंडल में भले ही विन्ध्य का प्रतिनिधित्व कमजोर हो और रीवा जिले का प्रतिनिधित्व तो शून्य के बराबर है लेकिन जनता को विकास कार्योंं से सरकार आपकी है प्रभारी मंत्री हैं तो जिलेेेे के विकास की गति नही रुकनी चाहिए.

  दिसंबर से अब तक 

मध्य प्रदेश में जनता ने कांग्रेस को जनादेश दिया लेकिन सबसे बड़ा सवाल अगर रीवा जिले के संदर्भ में पूछा जाए तो यही है कि दिसंबर से अब तक वह कौन सी बड़ी परियोजना है जिसे कांग्रेस सरकार रीवा लेकर आई या रीवा के विकास के लिए वह कौन सा मॉडल है जिसे लेकर काम शुरूूू हुआ है .यह सवाल जब कांग्रेस के जिम्मेदारों से पूछा जाता है तो वह एक ही तर्क देते हैं एक भी जनप्रतिनिधि यहां से नहीं है,करेंगे रीवा के लिए काम करेंगे ,अभी सरकार बने कितने दिन हुए हैं,लेकिन हकीकत में इस तरह के तर्कों से काम नहीं चलने वाला है.जनता ने सरकार चुनी है और सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है कि जिले के विकास को आगे बढ़ाएं.दिसंबर से अब तक किंग महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम शुरू हुआ यह सवाल जिम्मेदारों से अक्सर पूछा जाएगा.रीवा की जनता पूछेगी लेकिन इन 6 महीनों में सही मायने में कांग्रेस के पास इसका जवाब नहीं है.चुनावी व्यवस्थाओं का बहाना देकर आप जिले के कामों को पीछे नहीं ले जा सकते हैं.

  स्वास्थ्य,शिक्षा, रोजगार, कानून व्यवस्था के लिए क्या

रीवा जिले के प्रभारी मंत्री के रूप में लखन घनघोरिया मिले प्रभारी मंत्री बनने के बाद से लगभग तीन से चार बार वो रीवा आ चुके हैं लेकिन रीवा के लिए किस कोर्स ऑफ एक्शन के तहत काम करना है यह अब तक उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है.हर बार एक जांच का हवाला देकर और सिर्फ समस्याओं की पर्चियां लेकर वापस लौट जाते हैं ऐसे में रीवा कैसे आगे बढ़ेगा. अब इस बात से भी रीवा के लोग इंकार नहीं कर पाएंगे कि पहले जिस मॉडल के तहत रीवा में काम शुरू हुआ था अब शायद वह नहीं दिखता है. स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर 15 साल तक कांग्रेस बीजेपी को घेरती रही, अब जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का क्या हाल है, क्या कुछ परिवर्तन हुए? शिक्षा का क्या हाल है, रोजगार की क्या स्थिति है और कानून-व्यवस्था जिसको लेकर कांग्रेस लगातार बीजेपी को घेरती रही उसमें कितने सुधार हुए.प्रभारी मंत्री क्या सिर्फ समस्या सुनने वाले मंत्री बनकर रह जाएंगे या  जिले के विकास के लिए  क्या कुछ सार्थक पहल करेंगे.

 ट्रांसफर उद्योग और बिजली गुल से नाराजगी

आप सोचिए विधानसभा चुनाव में जिस कर्मचारी वर्ग ने कांग्रेस को समर्थन दिया वह 4 महीने बाद ही हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ क्यों हो गया .इसका सबसे बड़ा कारण कांग्रेस सरकार द्वारा मध्यप्रदेश में व्यापक पैमाने पर प्रशासनिक उथल-पुथल और ट्रांसफर उद्योग रहे. रीवा जिले में भी थोक में तबादले हुए आरोप लगे कि पैसे के एवज में यह उद्योग चलाया जा रहा है .बीजेपी ने भी कांग्रेस के ट्रांसफर करने की रणनीति को पैसे कमाने का एक जरिया घोषित किया और ट्रांसफर उद्योग को लेकर चौतरफा घिरी कांग्रेस सरकार को इसके परिणाम लोकसभा चुनाव में भी दिखने लगे.जब कर्मचारी वर्ग पूरी तरह से कांग्रेस से अलग हो गया जिसके कारण ही असंतोष देखा गया और सरकारी महकमे में अफरा-तफरी का असर कुछ यूं हुआ कि जनता को समस्या होने लगी. साथ ही सरप्लस बिजली के बाद प्रदेश में अघोषित कटौती से सरकार की छवि खराब हुई इसको लेकर भी सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे. रीवा जिले में प्रभारी मंत्री ने सख्त लहजे में कर्मचारियों और अधिकारियों को निर्देशित किया कि बिजली कटौती न की जाए जब वह यह कह  रहे थे उस वक्त ही बिजली कट गई .तमाम मुद्दे हैं जिनको लेकर सरकार चौतरफा घिर रही है जनता को सिर्फ उसके कामों से मतलब है क्षेत्र के विकास से मतलब है इसलिए यह सोचना होगा कि आखिर किस डेवलपमेंट मॉडल के तहत जिले के प्रभारी मंत्री रीवा जिले के 8 विधायकों को साथ में लेकर काम करेंगे.

 रीवा की जनता को राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई से कोई मतलब नहीं है,उसे कांग्रेस के अंदर की गुटबाजी से भी कोई मतलब नहीं, रीवा की जनता रीवा के व्यवस्थित विकास की उम्मीद लिए नई सरकार के जिम्मेदार मंत्रियों से उम्मीद लगा रही है लेकिन हकीकत यही है कि दिसंबर से लेकर जून तक रीवा के लिए कोई व्यवस्थित कार्य योजना अब तक नहीं बन पाई है. प्रभारी मंत्री के दौरे एक प्रायोजित और सिर्फ सीमित लोगों के बीच के दौरे बनकर रह गए हैं.जनसमस्याओं की बड़ी-बड़ी फाइलें तैयार हो गई हैं लेकिन उसके निराकरण के लिए क्या करना है यह अब तक निर्धारित नहीं हो पाया है .प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी मंत्रियों की कितनी बात सुन रहे हैं यह आगे आने वाले वक्त में और साफ हो जाएगा. जनता ने सरकार चुनी है जनता को काम से मतलब है आप जनता के सामने अपनी नाकामियों को छुपाकर सिर्फ कर्मचारियों पर दोषारोपण नहीं कर सकते हैं.

अमित मिश्रा(विंध्या टाइम्स)


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