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Wednesday 19th of June 2019 | देश एक, चुनाव अनेक ?

एक देश एक चुनाव पर क्या आज़ बन पायेगी सहमति | ममता बनर्जी नहीं होंगी बैठक में शामिल | विरोधियों और समर्थको की अलग अलग है राय | मोदी ने देश के विकाश के लिए इसे बताया ज़रूरी


प्रधानमंत्री ने एक देश, एक चुनाव के मुद्दे पर आज़ सर्वदलीय बैठक बुलायी है इस बैठक में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने तथा अन्य कई मुद्दों पर चर्चा होनी है |

प्रधानमंत्री मोदी का कहना है की देश में हर छह महीने इलेक्शन होते है जिससे प्रशासनिक कार्यों में रुकवाटे आती है | यदि देश में एक साथ चुनाव होगा तो सरकारें और पार्टियाँ विकास कार्यों पर ज्यादा ध्यान दे पायेंगी |

इस बैठक में ममता बनर्जी शामिल नही होंगी | उन्होंने एक पत्र लिखकर कहा है कि इतने बडे मुद्दे पर इतने कम समय में कैसे सहमती बन पायेगी | उन्होंने यह भी कहा है कि सभी दलों को एक देश, एक चुनाव पर अपने विचार रखने के लिये एक श्वेत पत्र जारी किया जाय |

इस मसले पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे टी एस कृष्णामूर्ति ने प्रेस से बातचीत में कहा कि “यह संभव है कि एक देश में एक चुनाव हो, लेकिन इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा |”

साल 1999 में विधि आयोग ने पहली बार अपनी रिपोर्ट में कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हों. साल 2015 में भी कानून और न्याय मामलों की संसदीय समिति ने चुनाव एक साथ करने की सिपारिश की थी |

जानकारी के लिए बता दिया जाय कि आज़ादी के बाद 1951-52 में चुनाव एक साथ हुए इसके बाद 1957, 1962  और 1967 में भी चुनाव एह साथ हुये फिर ये सिलसिला टूट गया |

एक देश,एक चुनाव का समर्थन करने वालों का कहना है कि मतदाता लोकसभा और विधानसभा के चुनावों के लिए अलग-अलग वोट करते हैं |

जबकि विरोधियों का कहना है कि ऐसा होने से एक मतदान केंद्र पर मतदाता एक ही पार्टी को वोट करेंगे |

 लेकिन समर्थको ने इसके विरोधी तर्क के रूप में ओड़िशा का उदहारण दिया है , जहां 2004 और हाल ही में 2019 के चुनाव परिणाम ने इस तर्क को भी खारिज़ कर  दिया है कि मतदाता एक मतदान केंद्र पर एक ही पार्टी को वोट देंगे |

बहरहाल यह देखना बाकि है कि अब इस मसले अलग-अलग पार्टियो की क्या राय है |


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