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Sunday 23rd of June 2019 | संविधान की मौलिकता का व्यवहारीकरण

भारतीय संविधान के इर्द-गिर्द धारणाएं


पारदर्शी समाज के निर्माण के लिए क्या उपाय किया जाय यह सवाल जब भी सामने आता है,तो मन में विचारों का सैलाब उमड़ आता है लेकिन सब सार्थक हो ऐसा नही लगता है | तो फिर क्या किया जाय कि समता के साथ समाज बिना भेदभाव के एक साथ निष्कपट होकर रहे |

बड़े-बड़े दार्शनिकों बड़े-बड़े समाज सुधारकों बड़े-बड़े विद्वानों ने मिलकर देश के आईन देश के संविधान का स्वरूप तैयार किया |जिसका मूल उद्देश्य समाज में एकरूपता स्थापित करना था |तो यह मान लिया जाय की हमारी पहली शैक्षिणिक योग्यता संविधान रटने की होनी चाहिए |क्योंकि जब तक नागरिकों में विशेषाधिकार व्याप्त है समानता का कोई अस्तित्व नहीं दिखायी पड़ता |समाज में अंतर इतने निचले स्तर तक है कि उसे दूर करने का उपाय तो यही दिखायी पड़ता की प्रथम शैक्षिणिक योग्यता संविधान हो फिर कोई अन्य डिग्री |

वास्तव में हर मौलिक कर्तव्यों से लेकर मूल अधिकारों की उपस्थिति क्यों कहीं नही दिखायी पड़ती हमारे इर्द गिर्द? हम विविधताओं के बीच रहकर खुद को क्यों समाज से विलग समझने लगे हैं ?हम खुद को अंधविश्वासों में क्यों जकड़े रहना चाहते हैं ?हम अपने धार्मिक चरित्र से बाहर आकर क्यों यह नही सोच पा रहे की हमारा अस्तित्व सिर्फ़ धार्मिक ग्रन्थों में वर्णित कर्तव्य बस नही है?

सभी “क्यों” का ज़बाब यह है कि वास्तविक दुनिया में रहकर भी हम काल्पनिक दुनिया में ज्यादा विश्वास करते हैं |हमरी ज़रूरते वास्तविक और हमारी सोच काल्पनिक हो गयी हैं |हम यह नहीं सोच पा रहे कि हम वैश्विक ही नही अपितु युनिवर्सल सोच वाले हो चुके हैं |

देश का संविधान निर्मित करने में देश के प्रत्येक हिस्से का हाथ था इस पर अभी भी कुछ लोग असहमत हो सकते है लेकिन इतना जरूर है कि प्रत्येक क्षेत्र की भूमिका को इसमें शामिल किया गया था और इस पर सभी की सहमती भी थी | इन सब के बावजूद देश में असमानता की लडाई देखने को मिल जाती है, महिलाओं के हक़ की बात हो, निम्न वर्गों के हक़ की बात हो , मुस्लिम के हक़ की बात हो, धार्मिक स्वतंत्रता की बात हो या कानूनी वरीयता के मामले में किसी भी समुदाय विशेष को विशेषाधिकार(SC STAct) देने की बात हो अक्सर ऐसे मामले संविधान को चुनौती देने के लिये सामने आ जाते हैं |

कभी मुसलमानों के दाढ़ी को शक की नज़रों से देखा जाता है तो कभी स्त्रियों की स्त्रीशीलता को निशाना बनाया जाता है तो कभी वैवाहिक बंधन को धार्मिक चोला पहनाने की कोशिश की जाती है तो कभी दुष्कर्म जैसी जघन्य अपराध को भी सांप्रदायिकता में बदलने की भी कोशिश की जाती है | जबकि अगर हम संवैधानिक दृष्टि से देखे तो इनका कोई स्थान ही नही है भारतीय समाज में |

संविधान के संरक्षक सुप्रीम कोर्ट को भी उसके शील होने का सबूत पेश करने का अस्तित्व संज्ञान में आता है तो वास्तव में मन में एक सवाल क्रौन्ध जाता है कि हम ऐसे विधि के शासन का भी कहाँ तक विश्वास करें जो खुद संघर्ष कर रहा हो | बहरहाल विधि जो भी हो उसका अनुपालन तो कागज़ो के बाहर भी होना ज़रूरी है |संविधान का व्यवहारीकरण होना ही चाहिए, चाहे क्यों न उसे “रटना” ही पड़े सबको, विधि के शासन की अनिवार्यता का संज्ञान तो होना ही चाहिए शासित लोगों को, चाहे क्यों न उसे प्रथम शैक्षिणिक योग्यता का आधार ही न बनाना पड़े |

 


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