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Wednesday 3rd of January 2018 | ईस्ट इंडिया बनाम मराठा संघ की आग है

अंग्रेजो के ज़माने की लड़ाई की आग आज भी सुलग रही


पुणे में सोमवार को शुरू हुई हिंसा प्रदर्शन ने मंगलवार आते-आते महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों को भी अपने आगोश में ले लिया है . दरअसल पूरा विवाद इस बात को लेकर छिड़ गया है की क्या 1818 में भीमा- कोरेगांव की लड़ाई जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा संघ के पेशवा शासकों के बीच हुई थी उसे मनाया जाना चाहिए या नहीं .

यह विवाद आज का नहीं है 1800 ईस्वी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने मराठों के राज्यों और पेशवा पर प्रभाव डालना शुरू किया था. पुणे पर अपना पूरा अधिकार जमाने के बाद अंग्रेजों ने बाजीराव द्वितीय को सतारा में शरण लेने को मजबूर कर दिया था.

1818 में पेशवा शासकों ने फिर से एक बार पुणे शहर को अंग्रेजों के कब्जे से आजाद कराने का फैसला किया और इसी लड़ाई में तकरीबन 20000 घुड़सवार और 10000 पैदल सैनिकों के साथ ज्यादातर मराठाओं को शामिल किया गया. अंग्रेजों ने भीमा-कोरेगांव नामक एक छोटे से गांव में शरण ली इसी समय पेशवा शासकों ने अपनी 2000 सैनिकों की टुकड़ी को ब्रिटिश सेना पर हमला करने का आदेश दे दिया .

1 जनवरी 1818 को अंग्रेजों में  ईस्ट इंडिया कंपनी में ज्यादातर दलित सैनिक शामिल किए गए, उन्होंने मराठा आक्रमण का सामना किया सैनिकों ने रात के दौरान लड़ाई लड़ी और मराठों से कोरेगांव गांव की रक्षा करने में कामयाब रहे. ईस्ट इंडिया कंपनी के 200 से 300 सैनिक मारे गए लेकिन पेशवा को भारी नुकसान हुआ क्योंकि उनके 700 सैनिक मारे गए मराठाओं की इतनी बड़ी सेना होते हुए भी इस लड़ाई में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और मजबूरन पीछे हटना पड़ा .

फसाद की जड़ 1818 में भीमा-कोरेगांव में पेशवा पर दलित की जीत को याद करते हुए दलित गौरव दिवस के रुप में मनाते हैं. दलित नेताओं और कार्यकर्ताओं का मानना है की वे इस जीत को पेशवाओं के खिलाफ निचली जाति की जीत के रूप में देखते हैं.


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