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Monday 8th of January 2018 | अध्यक्ष यथावत लेकिन बड़े फैसले होंगे?

छत्तीसगढ़ में हुए परिवर्तन की तर्ज पर मप्र. में भी होंगे परिवर्तन


मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीति के सियासी समीकरण कई बार एक जैसे ही रहते हैं . मध्य प्रदेश से पृथक राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़ की सियासत लगभग मध्य प्रदेश जैसी ही रही है बस फर्क इतना है की मध्यप्रदेश के मुकाबले छत्तीसगढ़ में कांग्रेस मजबूत है सदन से लेकर सड़क तक कांग्रेस सक्रिय होकर काम कर रही है . पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में राहुल गाँधी ने संगठन को मजबूत करने के दृष्टिकोण से परिवर्तन किये अब बारी मध्यप्रदेश की है हलाकि मप्र.प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव को यथावत रखा गया है लेकिन अभी बहुत कुछ होना बांकी है ?

छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पार्टी से अलग होने पर कांग्रेस का नुकसान हुआ है. मध्यप्रदेश में विधानसभा सीटों की संख्या मध्यप्रदेश में ज्यादा है इसलिए समीकरण थोड़ा अलग है . कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ में संगठन को दुरुस्त करने के लिए कुछ कड़े फैसले लिए, फैसले में अध्यक्ष पर लगाम लगाने के लिए दो कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति की गई जातिगत समीकरण आदिवासी बाहुल्य से नेताओं को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दी गई वही पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पत्नी रेणु जोगी को उपनेता प्रतिपक्ष के पद से हटा दिया गया. राहुल गाँधी के सिपाही पूर्व केंद्रीय मंत्री चरण दास महंत को फिर से राहुल गांधी ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देते हुए चुनाव प्रचार-प्रसार समिति का अध्यक्ष बनाया. पिछला विधानसभा चुनाव हार चुके रविंद्र चौबे को स्ट्रेटजिक मैनेजमेंट समिति का अध्यक्ष बनाया गया है, कुल मिला कर पूरा सलेक्शन देखें तो एक बात समझ आती है कि राहुल गांधी ने जातिगत समीकरण ,आदिवासी संतुलन के साथ-साथ वरिष्ठ नेताओं और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को तबज्जो दिया है उसी आधार पर एक ऐसी टीम बनाई गयी है.

मध्यप्रदेश में भी कुछ ऐसी ही रणनीति होगी-

राहुल गाँधी के दफ्तर एक पत्र जरी हुआ और उसमे बाकायदा यह लिखा गया की सभी वर्तमान अध्यक्ष यथावत रहेंगे इसके बाद से मप्र. के अटकलों के बाजार में विराम लग गया . अरुण यादव के समर्थक जश्न में डूब गये और सोशल में मीडिया में धन्यवाद और आभार व्यक्त करने लगे. अब ऐसे में सवाल यह उठता है की क्या पूरी जिम्मेदारी अरुण यादव और नेता प्रतिपक्ष पर होगी या अभी कुछ ट्विस्ट बांकी है. .

राहुल गाँधी यह भाप चुके हैं की किसी को तोड़कर मप्र. में राजनीति संभव नहीं क्योकि सबने अपने अपने क्षेत्र में अपनी पैठ मजबूत की है. अगर राहुल गाँधी ने जिस फार्मूले से छत्तीसगढ़ में समीकरण बनाया है उसी तरह से मध्यप्रदेश में भी वो कार्यकारी अध्यक्ष जैसे पद पर कुछ वरिष्ठ नेताओं को बैठा सकते है . सुरेश पचौरी, दिग्विजय सिंह,सिंधिया, कमलनाथ को बिना साधे मप्र.में कांग्रेस की वापसी संभव नहीं . जातिगत समीकरण. क्षेत्रीय समीकरण वरिष्ठ नेताओं के आधार पर आगामी समय में ऐसी संभावना है कि पवार को केंद्रीकारण नहीं बल्कि विकेंद्रीकरण किया जाएगा. जरूरी नहीं कांग्रेस मुख्यमंत्री का चेहरा प्रोजेक्ट करे. कांग्रेस अलग-अलग क्षेत्रीय क्षत्रपों पर बड़ी जिम्मेदारियां सौंपकर चुनाव में जाने के निर्देश दिए जा सकते हैं. अध्यक्ष अरुण यादव ही रहेंगे लेकिन भविष्य में  कोआर्डिनेशन के लिए चार कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का भी प्रस्ताव रखा जा सकता है. प्रचार प्रसार समिति का अध्यक्ष सिंधिया को बनाया जा सकता है फिर ऐसे में चुनावी रणनीति की जिम्मेदारी कमलनाथ को दी जा सकती है फिर दिग्विजय सिंह और बांकी सीनियर नेताओं का क्या होगा ऐसे कई सवाल आगे आने वाले समय में खड़े होंगे.

ऐसे भी हो सकते हैं समीकरण-

कुछ दिन पहले ख़बरें थी की मध्यप्रेश को अलग-अलग खण्डों में बांटकर जिम्मेदारी सौपी जाएगी जिसके अंतर्गत नर्मदांचल दिग्विजय सिंह और सुरेश पचौरी, गोंडवाना-जबलपुर कमलनाथ ,बुंदेलखंड सिंधिया, मालवांचल जीतू पटवारी-कांतिलाल भूरिया, निमाड़ अरुण यादव, अजय सिंह राहुल को विन्ध्य की जिम्मेदारी दी जा सकती है .अब जबकि विधानसभा चुनाव को मात्र 8 महीने ही बचे हैं ऐसे में सबसे ज्याद आसार ऐसे समीकरण के ही हैं क्षेत्रीय नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी देकर चुनाव लड़ा जाये.

 दिग्विजय को साधना पड़ेगा-

 मध्यप्रदेश में जमीनी स्तर के कांग्रेस कार्यकर्त्ता दिग्विजय सिंह के भी साथ हैं ऐसे में प्रदेश की कमान किसी के भी पास हो उसे दिग्विजय सिंह को साधना   होगा. दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा यात्रा के ठीक बाद यह तो निश्चित है की कुछ परिवर्तन होंगे . सबसे ज्याद संभावना छत्तीसगढ़ जैसे फार्मूले या   क्षेत्रीय स्तर पर जिम्मेदारी दी गयी जा सकती है .


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