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Wednesday 17th of January 2018 | आइये जानते हैं कुंभ स्नान के बारे में

क्या है कुंभ स्नान का इतिहास


महाकुंभ 12 वर्षों में आने वाला वह त्योहार है जिसका लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता है कुंभ में हर व्यक्ति गंगा स्नान का शुभ फल पाने की कोशिश करता है भारत देश के साथ साथ ही कुंभ स्नान करने के लिए विदेशों से भी लोगों का आना होता है और गंगा माई में डुबकी लगाकर लोग अपने पापों को धोते है.

आपको बता दें कुंभ पर्व के आयोजन को लेकर कई प्रकार की पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. जिसमें सबसे ज्यादा लोगों की मान्यता है. संमुद्र मंथन की बूंदें गिरने को लेकर. इस कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब देवतागंड़ कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया.

देवताओं ने अपनी हार को लेकर क्षीरसागर का मंथन किया जिससे अमृत की बूंदे निकालीं और उस अमृत कुंभ को एक कलश में भरकर देवता आकाश में उड़ गए. जिसे दैत्यों ने छीनने की कोशिश की जिसपर उस कलश की कुछ बूंदे छलक कर पृथ्वी के चार स्थानों में प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में गिर गई.इस कलश को छीनने का प्रयास भी दैत्यों के द्वारा 12 दिनों तक चला था जिसकी अवधि मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होती है. इस कारण से भारत के इन चार स्थानों पर हर बारह वर्ष में महाकुंभ मेले का आयोजन किया जाता है.

वैसे तो इन चारों स्थानों में हर तीन वर्षों में कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है और हर छ; वर्ष में अर्धकुंभ का लेकिन हर बारह वर्ष में इस मेले को महाकुंभ के रूप में आयोजित किया जाता है. जिससे इस महाकुंभ मेले का इंतजार देश विदेश के ज्यादातर लोगों को रहता है. यह महाकुंभ का मेला जहां भी लगता है तो करोड़ों की तादाद में जनता की भीड़ देखने को मिलती जो इन स्थानों पर जाकर गंगास्नान करते है तथा मेले का लुत्फ उठाते है.  


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