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Saturday 20th of January 2018 | चला गया विंध्य का दादा

कोई नेता नहीं, विंध्य का शेर, विध्य का दादा चला गया


आज पूरे विंध्य में शोक की लहर आखिर क्यों ? ये शोक की लहर इसलिए नहीं हैं कि आज उनके बीच उनका नेता नहीं बल्कि इसलिए हैं क्योंकि आज उनके विंध्य की शान, विंध्य का दादा उनका दादा उनके बीच नहीं है.

विंध्य प्रदेश में लोग दादा को अपना नेता नहीं बल्कि अपने घर के वरिष्ट व्यक्ति के रुप में मानते थे. विंध्य का हर व्यक्ति अपने मन में यह सोच रखता था कि अगर कोई दिक्कत होती है तो दादा अभी जिंदा हैं वह सभांल लेंगे. लेकिन अब विंध्य के लोगों के लिए आज का यह दिन काफी दुखद हो गया क्योंकि उनके बीच उनके घर का वरिष्ट व्यक्ति नहीं रहा उनका दाद नहीं रहा.

आज पूरा विंध्य सूना हो गया वो भी सिर्फ इसलिए कि विंध्य का दादा नहीं रहा.दिल्ली के एक अस्पताल से दादा नें जैसे ही अपनी अंतिम सांस ली वैसे ही विंध्यवासी स्तब्ध रह गए ऐसा लगा मानो दादा कि सांस विंध्यवासियों के साथ ही चल रही थी दादा के चाहने वालों को अब कुछ सूझ ही नहीं रहा है कि आखिर अब उनका क्या होगा अब कौन उनके साथ दुख की घड़ी में घर का मुखिया बनकर दादा बनकर उनके साथ  खड़ा होगा.

आज विंध्यवासियों का दादा के प्रति यह स्नेह इसलिए भी देखा जा रहा है. क्योंकि दादा ने कभी यह कहा था कि हमारे लिए कोई कुर्सी मायने नहीं रखती बल्कि विंध्य की जनता उसका प्यार मायने रखता है


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