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Wednesday 31st of January 2018 | राजनैतिक साजिश की शिकार जनता

‘पद्मावत’ विवाद और सरकारी तेल कंपनियों के बढ़ते मुनाफ़े के बीच फँसी जनता


‘’राजनीति का असर इतना व्यापक होता है की कभी कभी समझ नही आता, क्या सही है क्या झूठ . स्थिति ये है की देश के हर बड़े मुद्दे के समानान्तर एक और छद्म मुद्दा चलाया जाता है , जब देश उसी झूठ में डूबा हुआ होता है तब तक वो बड़ा मुद्दा अपनी मंजिल प्राप्त कर लेता है , उसके बाद हिंदी की कहावत चरितार्थ होती है अब पछताए होत का जब चिड़िया चुग गई खेत...... ’’

देश की जनता मंहगाई की मार से तड़प रही है , गैस,डीजल और पेट्रोल के भाव तो कोहली के शतक की तरह बढ़ रहे हैं, और हम पिछले एक महीने से उलझे रहे पद्मावत की रीलीज को लेकर ..फिल्म कहाँ बैन है , कौन देख रहा है, किसने क्या कहा है ? और जब हम ये सब कर रहे थे तभी धीरे धीरे हमारी जेब खाली होती गयी और हमें पता भी चला , सच तो ये है की हम भारतीयों का अपनी भावना के उपर कोई नियंत्रण नही है ,कोई भी आके हमारी भावना का अपने तरीके से इस्तेमाल कर जाता है,

अब बात काम की... पिछले कई वर्षो से हम सुनते आ रहे हैं  की पेट्रोलियम के भाव इस लिए बढ़ाये गए हैं क्यों की वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल कीमत बढ़ गयी है , लेकिन इस बार आश्चर्य जनक बात ये है की कच्चे तेल की कीमतें कम हो रही है फिर भी तेल के दाम बेतहाशा बढ़ रहे हैं, जिससे कुछ आंकड़े देखिये ....

वर्ष                           तिमाही                   मुनाफ़ा                          वृद्धि

2016                 (अक्टूबर से दिसम्बर )          3994.91 करोड़

2017                (अक्टूबर से दिसंबर  )           7883.22 करोड़                 97%

मतलब साफ़ है सरकारी कम्पनी ने इस साल की तिमाही में 97% के वृद्दि दर्ज की फिर भी आम जनता को महगाई कोई राहत नही है , सरकारी कंपनी ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से तेल तो सस्ते में खरीदा , लेकिन पेट्रोल-डीजल मंहगे दामो में बेंचती रही जिससे कंपनी का रिफायनिंग मार्जिन बढ़ता चला गया , पेट्रोल की कीमतों ने चार साल के उच्चतम स्तर को छुआ वहीँ डीजल अब तक के सबसे ऊँचे स्तर में पहुँच गया है,

आश्चर्य की बात ये है की इस पूरे घटना में विपक्ष का रवैया सुस्त नज़र आ रहा है , जबकि ऐसे मौकों पर विपक्ष को सरकार की इस नीति का पुरजोर तरीके से विरोध करना चाहिए था , और शायद यही कारण है की कांग्रेस को नाकारे विपक्ष की संज्ञा दी जाती रही है . लोकतंत्र का दूसरा विपक्ष मीडिया भी इस बात से बेखबर नज़र आया ,और अच्छे दिन लाने वाली सरकार ने जनभावनाओं के गलत इस्तेमाल के साथ , लोगो से विश्वासघात किया .

 


जिस पत्रकारिता का कभी स्वर्णिम युग ना था , उसमे स्वर्णिम व्यक्तित्व की तरह उ

अटल जी के निधन से आहत हुआ देश !


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