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राजनीति की यूनिवर्सिटी : रीवा

राजनीति की यूनिवर्सिटी : रीवा


" हालाते हिन्दुस्तान बयां कर रहा हूँ यूँ तो पूरे देश में हर ग्रुप का एक नेता होता है ,इससे इतर हमारे रीवा में नेताओं का ग्रुप होता है, माहौल ये है शहर में चलते हुए राजश्री (पान मसाला) भी देख कर थूकना पड़ता है कि कहीं नेताजी के ऊपर न पड़ जाए ,और देश के तमाम मंत्रालयों का वहीँ जमावड़ा लग जाए "

यूपी में एक कहावत है की हमारे चाचा विधायक हैं, बनारस की गलियां हो कि लखनऊ का चौराहा हर जगह इस तरह की धौंस देने कई लफंटर मिल जायेंगे और हमारे रीवा में तो हर छुटभैया नेता कहता है हम विधायक बनेंगे! आशावाद का इससे सुन्दर उदहारण शायद कहीं और देखने को न मिले,दुनिया का ये पहला ऐसा शहर है जहाँ हर आदमी के नाम के पहले या बाद में नेता जरूर लगा है म1n

सलन फलां पार्टी के नेता रमेश कुमार, ये बिलकुल निठल्ले टाइप के नेता है फिर आते है पढाई लिखाई से कोई सरोकार न खाने वाले छात्र नेता , इस टाइप के नेता पिताजी की गाढ़ी कमाई से अपनी नेतागिरी की दूकान चलाते हैं , इसके बाद आते हैं कुछ काम धंधा कर घर चलाने वाले नेता जैसे किसी की दूकान है तो वो है व्यापारी नेता ,कोई किसान है तो वो है किसान नेता इसी तरह मजदूर नेता , बैंक कर्मचारी नेता , लिपिक नेता , अशासकीय कर्मचारी नेता, ऑटो चालक नेता , ठेला रेहड़ी नेता , भिखारी नेता .......मतलब हर कोई नेता |

हालत ये है की जिस आदमी ने मेरा मतलब नेता ने अपनी खुद की गाडी पुलिस चेकिंग दौरान पकडे जाने पर पैसे देकर छुड़ाई हो वो भी लोगो के अवैध निर्माण को वैध कराने का आश्वासन देता दिखाई देता है,यहाँ लोगो के पास इतनी राजनीतिक समझ है की बाहर का एक मंझा हुआ नेता भी घुटने टेक दे ,जैसे यहाँ का एक छोटा नेता भी ये बता सकता है की हार के बात भी स्मृति इरानी को महत्वपूर्ण मंत्रालय क्यों दिया गया ? खैर ऐसे कई उदहारण मार्केट में मिल जायेंगे|

यहाँ के लोगों के जीवन का लक्ष्य ही एक बार विधानसभा पहुँचने का होता है और घर में तो रोज़ ही दिल्ली दरबार सजता है , कभी भोपाल किसी काम से जाने पर उनका ये लक्ष्य अपने पूरे सबाब में आ जाता है , फिर विधानसभा देखने की इच्छा जरूर ज़िक्र होता है , ज़िक्र क्या पहुचते भी हैं ....विधानसभा दूर से देखने के बाद वहां का माहौल वही होता है कि 'माँ को अपने बेटे किसान को अपने लहलहाते खेत देख कर जो आनंद आता है वही आनंद रीवा वालों को विधानसभा देखकर आता है '

यहाँ बैक ग्राउंड में कुछ भी चल रहा हो चल शादी, पार्टी, बीमारी , अस्पताल , उठावना , दाह संस्कार बातकी शुरूआत ही होती है 'और तिवारी जी ये क्या चल रहा है आपके शासनकाल में ' और फिर चालू होता है राजनीति का के गूढ़ सत्यों का, मेरा व्यकिगत मत है की भारत सरकार को राजनीति विषय पर उच्च शिक्षा हासिल करने वालों को कुछ समय के लिए रीवा में रहना अनिवार्य कर देना चाहिए जिससे उनके अन्दर वांछित निखार आ पाए और वो इन सत्यों को परख सके और फिर बात समाप्त होती है अरे छोडिये! तिवारी जी सब राजनीती है .....


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