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मातृभाषा दिवस में आज : बघेली स्पेशल

कहाँ खड़ी हय आपन बघेली !


आधुनिकता और दिखावे के इस दौर में, सभ्यता, संस्कृति और संस्कार से वैश्विक होने के दौड़ में हिंदी और अपने क्षेत्र की सबसे प्यारी बोली बघेली का अस्तित्व कहाँ है?  देखिये एक छोटा विश्लेषण मातृभाषा दिवस में :

इतिहास

पूर्वी हिंदी की प्रमुख बोली है बघेली! जिसे बघेल वंश के राज्य से पहले ‘रिमाई’ और ‘रिमहाई’ के नाम से जाना जाता था , वह काल लगभग 8 वीं से 12वीं  शताब्दी का रहा होगा, 13वीं शताब्दी से लेकर अबतक इसे बघेली ही पुकारा जाता है, बघेल राजवंश के अधिपत्य के बाद क्षेत्र में बघेली खूब फली फूली और इसका प्रयोग क्षेत्र भी बढ़ा ,राजभाषा से जनभाषा तक यह बोली रिमाई से बघेली बनी ,

बघेली का प्रयोग करने वाला क्षेत्र

बघेली बोलने वाला क्षेत्र छोटा नही था, उत्तर में इलाहाबाद से लेकर दक्षिण में बिलासपुर तक , पूर्व में मिर्ज़ापुर से लेकर पश्चिम में जबलपुर तक इसके बोले जाने के साक्ष्य मिलते हैं. बघेली भाषा का केंन्द्र रीवा (रीमा ) रहा है ,  मुख्य रूप से बघेली पूर्वी मध्यप्रदेश के सात जिलों में बोली जाती है जिसमे रीवा , सतना , सीधी, शहडोल , उमरिया ,अनूपपुर, और सिंगरौली शामिल है, कुल मिला कर कहा जाये तो तत्कालीन विन्ध्य प्रदेश का क्षेत्र पूरी तरह से आम बोल चाल की भाषा में  बघेली का उपयोग करता है, बघेली बोलने वाले लोग आज देश के किसी भी हिस्से में अपनी विशिष्ट भाषा शैली के लिए भी प्रसिध्द हैं.

बघेली संस्कृति

वास्तव में देखा जाय तो बघेली केवल एक बोली नही है बल्कि मुक्कमल संस्कृति है , इसमें खान-पान रहन-सहन , पहनावा, संगीत , नृत्य , लोक सभ्यता और संस्कृति का अपना एक तरीका है जो हमें अन्य किसी भी बोली या भाषा से अलग करता है, खान पान की बात करें तो यहाँ व्यंजनों का अपना एक मेनू कार्ड है जो शायद कहीं और न मिले प्रमुख रूप से बरा, मुगौरा, रसाज ,बग्जा ,चउसेला , फुलउरी, रिकमज इसी तरह के अनेकों व्यंजनों का भंडार भरा है इसी तरह यहाँ का पहनावा विशेष आयोजनों के लिए अलग अलग है जो आधुनिकता के साथ समाप्त होने की कगार में है ,जैसे विवाह में वर के लिए यहाँ का पहनावा है जामा जोरा जिसका प्रयोग शायद ही कहीं देखने को मिलता है . यहाँ शादी- विवाह , सामाजिक व्यवहार , और त्योहारों को मनाने बड़ा ही निराला ढंग है

वर्त्तमान दौर में अस्तित्व

समय के साथ हर सभ्यता और संस्कृति मे बदलाव अवश्य होते है , बघेली भी इससे अछूता नही है मगर आज के सोशल मीडिया के दौर में भी बघेली के अस्तित्व का खतरा नज़र नही आता है बल्कि नए तरीके से इसमें बदलाव कर के लोगो द्वारा उपयोग किया जा रहा है, किसी बोली को जीवित रखने का सबसे पहला मापदंड होता है नई पीढ़ी की स्वीकारिता और रीवा क्षेत्र के लोगो की विशेषकर युवाओं को आज भी बघेली अपनी मिठास की ओर आकर्षित कर रही है, यही कारन है कि ठेठ बघेली छोड़ दिया जाए तो नए रूप वाली अंग्रेजी मिश्रित बघेली खूब देखने को मिल रही है ,

कुल मिला के देखा जाए तो आधुनिकता की अंधी दौड़ में बहुत सारे तौर तरीको ,रीति रिवाजों को भुलाया जा चुका है , शहरी क्षेत्रो में इनका अनुपात ज्यादा है, मगर अभी भी बहुत कुछ शेष है जिससे बघेली सभ्यता जीवित नज़र आती है,क्षेत्रीय साहित्कार ,कलाकार ,प्रबुद्ध लोग इसके संरक्षण में सतत प्रयासरत है, रीवा स्थित अवधेश प्रताप सिंह विश्वविध्यालय भी इस बोली और संस्कृति के संरक्षण के लिए एक नए विभाग भी स्थापना की है जहाँ से छात्र आज बघेली भाषा का ज्ञान प्राप्त कर रहे है और इसी विषय पर शोध भी किये जा रहे है जो विश्वविध्यालय का एक  सराहनीय पहल है


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