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Sunday 25th of March 2018 | एक पत्रकार जीना चाहता था लेकिन ...

जिन्दगी की जंग हार गया अतुल


अतुल जीना चाहता था, मगर इस सिस्टम ने उसे मार डाला…अगर हम अब भी चुप रहे तो शायद सिस्टम के साथ-साथ हम भी उतने ही दोषी होंगे…ये कैसा सिस्टम बनाया है हमने, जहां किसी आम इंसान की जान की कोई कीमत ही नहीं है…अमित भैया पिछले डेढ़ महीने से अतुल को बचाने के लिए लड़ रहे थे,सब कुछ छोड़कर 24 घंटे सिर्फ अतुल के पास रहते थे…उनकी उम्मीद और मेहनत का धीरे-धीरे असर भी हो रहा था…अतुल भी लड़ रहा था, उखड़ती सांसों से ही सही, मगर उसने हार नहीं मानी थी, वो जीना चाहता था…लेकिन इस सिस्टम ने एक झटके में सब कुछ छीन लिया…सारी उम्मीदें तोड़ दी…अरे क्या मतलब जनता के करोड़ों रुपए खर्च करके ऐम्स जैसी बड़ी-बड़ी अस्पताल बनवाने का, जहां आदमी की जिंदगी की कीमत ही नहीं समझी जाती…वहां उसे जीते जी मार दिया जाता है,अतुल के साथ भी तो ऐसा ही हुआ।

पिछले सवा महीने से वो नोबल अस्पताल के वेंटिलेटर में जिंदगी की जंग लड़ रहा था…उसका आपरेशन भी सफल हो चुका था…कुछ-कुछ सुधार भी दिख रहा था…एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए निजी अस्पताल में 40 दिनों तक वेंटिलेटर का खर्च उठाना इतना आसान नहीं था,मगर अतुल के घरवालों ने अपने जीवनभर की कमाई लगा दी ताकि अतुल बच सके क्योंकि अतुल खुद इस दुनिया से नहीं जाना चाहता था…फिर सबने मिलकर फैसला लिया कि अब अतुल का आगे का इलाज प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल ‘एम्स भोपाल’ में कराया जाएगा क्योंकि वहां सुविधाएं काफी अच्छी हैं और घरवालों पर इतना ज्यादा आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ेगा…लेकिन उस बड़ी अस्पताल के अंदर इंसानियत नाम की कोई चीज ही नहीं थी…लानत है डॉक्टर सुमित शहगल जैसे इंसानों पर…शर्म आती है इस सिस्टम पर…कहने को तो आम आदमी के अच्छे इलाज के लिए बनाया गया था ना एम्स अस्पताल…कहां मिला इलाज…किसको मिला इलाज…सिर्फ नेताओं और उनकी औलादों को…अगर एम्स अस्पताल के कर्मचारियों और डॉक्टर सुमित सहगल में थोड़ी भी इंसानियत होती तो अतुल आज हमारे बीच होता…लेकिन क्या कहें इस सितमगर सिस्टम को।

अतुल को जब नोबल अस्पताल से एम्स लाया गया था,तब उसकी हालत स्थिर थी..पहले से कुछ सुधार ही हुआ था…लेकिन इस बेदर्द सिस्टम ने सब खत्म कर दिया…पहले तो डॉक्टर सहगल ने अतुल को एम्स में भर्ती करने से ही मना कर दिया…फिर किसी तरह एडमिट किया तो इलाज में लापरवाही शुरू कर दी और अतुल के परिजनों पर जबरन दबाव बनाया जाने लगा कि वो अतुल को यहां से ले जाएं…हद तो तब हो गई जब अतुल के परिजनों से सफेद कागज पर जबरन ये दस्तख्त करवाने की कोशिश की गई कि वो अतुल को अपनी मर्जी से यहां से लेकर जा रहे हैं.जबकि उस वक्त भी अतुल की धड़कनें चल रहीं थीं…अमित भैया को अब भी उम्मीद थी कि अतुल फिर उठेगा इसलिए वो डॉक्टर से उसे वेंटिलेटर पर रख इलाज करने की गुजारिश करते रहे लेकिन सिस्टम तो सिस्टम है साहब…सिस्टम में इंसानों की सुनवाई होती कहां है…मानवता / इंसानियत / जिम्मेदारी इन सबको तो सिस्टम ने पहले ही बेच खाया है…क्या कर लोगे आप उनका…अतुल एक युवा पत्रकार था…सोंचिए जब एक पत्रकार के परिवार को सरकारी अस्पताल में अच्छे इलाज के लिए इतनी जद्दोजहद करनी पड़ती है तो आम आदमी का एम्स जैसे अस्पतालों में क्या हाल होता होगा?

एम्स में डॉक्टरो की लापरवाही के चलते लगातार अतुल की हालत बिगड़ने लगी…उसे वेंटिलेटर पर ना तो सही तरीके से एंटीबायोटिक का डोज दिया गया और ना ही सही इलाज किया गया…जो अतुल नोबल अस्पताल में लगातार रिकवर कर रहा था अचानक एम्स में आते ही उसकी हालत कैसे दिन ब दिन खराब होने लगी..यहां तक कि अतुल कि इच्छानुसार उसका अंगदान भी नहीं किया जा सका…जानते हैं क्यों…क्योंकि उसके सारे अंगों में संक्रमण फैल चुका था…जिसकी तस्दीक बंसल अस्पताल और भोपाल आर्गन सोसायटी की टीम की जांच रिपोर्ट भी करती है…यानि साफ है एम्स में ही अतुल की जान के साथ खिलवाड़ किया गया… न उसका ध्यान रखा गया न सही उपचार किया गया,अगर सही इलाज होता तो उसके बाडी में संक्रमण कहां से आता…हां एम्स प्रबंधन ने अतुल के परिजनों को मानसिक रूप से परेशान करने का काम बखूबी निभाया…लेकिन कोई इस सिस्टम के खिलाफ फिर भी प्रश्न नहीं उठाने वाला है…सब खामोश रहेंगे…लेकिन कब तक ?

खैर मानसिक नपुंसकता के इस दौर में नामर्द हो चली इस मीडिया से सिस्टम से सवाल करने की उम्मीद भी अपने आप में बेमानी है!

भोपाल दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट

एम्स जैसी सरकारी अस्पतालें बजट और सुविधाओं के इंतजार में मरीजों की कब्रगाह बनती जाती हैं…साल दर साल स्वास्थ्य और चिकित्सा का बजट तेजी से घटता जा रहा है…कोई पूछने वाला नहीं है, अस्पतालों में आम आदमी के साथ जानवरों से भी बुरा बर्ताव किया जा रहा है..कोई देखने वाला नहीं है…मानो डॉक्टरों की शक्ल में संगठित डकैतों का कोई गिरोह काम कर रहा है…स्वास्थ्य को सेवा से धंधा बना लिया गया है…हर बात पर आपको डराया जाता है…लेकिन गलती आपकी है…बजाते रहिए घर में छी न्यूज जैसे चैनल के सामने बैठकर हिंदू-मुस्लिम का झुनझुना…मत करिए स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार का सवाल…जो आपके अधिकारों का सवाल करे उसे बोलते रहिए देश-द्रोही…यही सिस्टम चाहिए था ना आपको… जहां फकीर नेता सी प्लेन लेकर पानी में लैंड करता है,एक घंटे के लिए करोड़ों का किराया चुकाया जाता है लेकिन दूसरी तरफ सरकारी अस्पतालों में आम इंसान का ढंग से इलाज तक नहीं किया जाता पैसे,बजट और सुविधाओं का रोना रोकर…हो भी कैसे क्योंकि जब शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगार का सारा पैसा सरकार अपने आभा मंडल को चमकाने और विदेशी दौरों पर बहा देगी, तो अस्पतालों में दवाएं और अन्य सुविधाएं कहां से आएगी…सब खेल है…एक दिन सारी सरकारी अस्पतालों का निजीकरण कर दिया जाएगा…सबका अपना-अपना कमीशन फिक्स होगा…तब भी सिर्फ गरीब मरेगा…याद रखिएगा ये सिस्टम किसी का सगा नहीं हैं…जिसके लिए आप नारे लगाते हैं…जिसके लिए आप अगले को क्रिश्चन से लेकर न जाने किसकी-किसकी औलाद बताते हैं,वही सिस्टम आपके अपने को निगल रहा है..ये तो सिर्फ एक अतुल की कहानी है…देश में ऐसे हजारों अतुल हैं जो हर रोज इस बेदर्द सिस्टम का शिकार हो रहे हैं…

अगर अब भी आप चुप रहे तो अगला नंबर आपका ही है…अतुल के लिए आपको आगे आना होगा…इस सिस्टम को सबक सिखाना होगा…एक पत्रकार को आज इंसाफ चाहिए, मालूम है बड़े मीडिया हाउस हम जैसे छोटे पत्रकारों का साथ नहीं देंगे, लेकिन इस बार हम भी पीछे नहीं हटेंगे…बहुत हुआ सम्मान अब सिर्फ इंसाफ होगा….मैं अतुल को इंसाफ दिलाने के लिए इस लड़ाई में अमित भैया के साथ खड़ा हूं…क्या आप भी हमारा साथ देंगे।

 


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