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जल्द होगी घोषणा

अध्यक्ष और प्रभारी का बदलना तय


प्रदेश प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष ने बनायीं संगठन से दूरी-

मप्र.बीजेपी में इन दिनों कुछ ठीक नहीं चल रहा है. लम्बे समय से संगठन में परिवर्तन की बात चल रही है. संगठन में प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार चौहान की पकड़ कमजोर हुई है, ऊपर से उनके बेतुकी बयानबाजी के कारण बीजेपी को मुह की खानी पड़ी है. उपचुनावों में मिली हार पर भी संगठन ने चिंतन नहीं किया जिसका परिणाम यह हुआ की आगे जो भी उपचुनाव हुए उनमे बीजेपी को हार ही नसीब हुई. संघ भी मप्र. में बीजेपी के काम से खुश नहीं है. आरएसएस के इंटरनल सर्वे में भी बीजेपी की स्थिति ठीक नहीं है. सर्वे में लगभग 70 विधायकों की हारने की संभावना जताई गयी है.

इन नामों पर चर्चा-

ऐसे में परिवर्तन की बात करना सही भी है. प्रदेश अध्यक्ष पद पर बैठने के लिए बड़े नाम वाले नेता अपनी लाबिंग कर रहे हैं. लम्बे समय से नंदकुमार चौहान को बदलने की चर्चा सियासी गलियारों में है .नंदकुमार चौहान को दरअसल शिवराज सिंह का भरपूर समर्थन मिल रहा है इसलिए इतनी देरी हो रही है .चित्रकूट उपचुनाव में हार के बाद से बीजेपी में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी थी की प्रदेश अध्यक्ष बदले जा सकते हैं. अब बदलाव की स्थिति में संगठन पुराने प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को वापस कमान सौपने की फिराक में है.नरेंद्र सिंह तोमर के कार्यकाल में बीजेपी काफी मजबूत थी इसलिए संगठन यह निर्णय ले सकता है.मप्र.सरकार में जनसंपर्क मंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्रा भी प्रदेश अध्यक्ष पद की रेस में आगे हैं. इसके साथ ही संगठन महामंत्री बी.डी.शर्मा का भी नाम प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए सामने अ रहा है.सूत्र को बताते हैं की कैलाश विजयवर्गीय के नाम की भी चर्चा है लेकिन कैलाश विजयवर्गीय का कहना है की उनके पास बड़ा दायित्व है.जबलपुर सांसद राकेश सिंह के नाम पर भी सहमति बन सकती है.

प्रदेश प्रभारी भी बदलेंगे-

संगठन ने सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष को नहीं बल्कि प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे को भी बदलने का निर्णय लगभग ले लिया है. अब उनकी जगह भूपेन्द्र यादव बतौर प्रभारी मप्र. में तैनात हो सकते हैं.चुनावी साल में बीजेपी की कोशिश होगी की ऐसा प्रभारी मिले जो संगठन को एक अलग रफ़्तार दे सके.

चुनावी साल में नेतृत्व परिवर्तन के मायने-

मूल में विधानसभा की जीत ही टारगेट है और अगले ही साल आम चुनाव भी हैं.चुनावी साल में नेतृत्व परिवर्तन के अलग मायने हैं. संगठन को बदलने और जिम्मेदारी किसी और को सौपने में यह भी देखना होता है की कहीं बगावत न हो जाये.ऐसे में संगठन एक व्यक्ति से जिम्मेदारी लेने के बाद कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी सौप भी सकता है .चूँकि नवम्बर में चुनाव है इलसिए कोई भी दाव गलत नहीं होना चाहिए. चुनाव क दृष्टिकोण से ये परिवर्तन महत्वपूर्ण हैं.


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