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Wednesday 18th of April 2018 | चिंतन और विश्लेषण से हुआ फैसला

विशेष -कैसे बनी राकेश सिंह के नाम पर आम सहमति:अमित मिश्रा


लम्बे समय से एक चर्चा और हर बार कुछ न कुछ अड़चने और फिर विराम.वैसे तो बीजेपी में फैसले काफी सोच समझकर और रणनीति के साथ लिए जाते हैं. हुआ भी ऐसा लम्बे समय से भोपाल से लेकर दिल्ली तक चर्चा थी लेकिन किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पा रही थी. मप्र.में भी बीजेपी के कई कद्दावर नेता हैं और सबको साधते हुए कोई निर्णय लेने में ही संगठन की भलाई होती है.

नन्दकुमार चौहान लम्बे समय तक अध्यक्ष रहे लेकिन पिछले लगभग 1 साल में उनका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा .अमित शाह के भोपाल दौरे के बाद कयास लगाये जा रहे थे की परिवर्तन तो होगा ही लेकिन कब और कैसे होगा इस पर कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था .चित्रकूट उपचुनाव उसके बाद निकाय चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा और फिर मुंगावली-कोलारस में बीजेपी की हार के बाद साफ़ हो गया था की अब संगठन में नंदू भैया की पैठ कमजोर हो गयी है. कल यानी 17 अप्रैल को शिवराज सिंह ने भी दबी आवाज में कह दिया की नंदकुमार चौहान अपने पद से मुक्त होकर अपने संसदीय क्षेत्र में काम करना चाहते हैं और जैसे ही शिवराज सिंह ने यह बयान दिया साफ हो गया की इंतज़ार की घड़ियाँ समाप्त और उसके ठीक अगले ही दिन एक नाम चुन लिया गया जबलपुर से सांसद राकेश सिंह का.

दिग्गजों को मात देते आगे निकले राकेश सिंह-

राकेश सिंह का नाम यूँ ही एक दम से सामने नहीं आया बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी कहानी है. दरअसल प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान केन्द्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का नाम था .अभी कुछ दिन पहले दिल्ली में नरेंद्र सिंह तोमर और शिवराज सिंह की मुलाकात के बाद ऐसा लगा था की नरेंद्र सिंह तोमर के नाम पर मुहर लग जाएगी लेकिन सही मायने में यह मुलाकात राकेश सिंह के सन्दर्भ में ही हुई थी. दूसरे सबसे प्रबल दावेदार डॉ.नरोत्तम मिश्रा थे . नरोत्तम मिश्रा शिवराज सिंह की कैबिनेट में मंत्री हैं और कुशल चुनाव प्रबंधन और संगठन की बारीकियों को समझते हैं साथ ही सरकार के ऊपर विपक्ष द्वारा किये गये प्रहारों का जवाब देना इन्हें बखूबी आता है. राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का नाम भी सामने आया था लेकिन उन्होंने साफ़ कह दिया था की उनके पास बड़ी जिम्मेदारी है. उद्द्योग मंत्री राजेन्द्र शुक्ला के नाम की भी चर्चा थी लेकिन सहमति सिर्फ राकेश सिंह के नाम पर हुई .

कांग्रेस की हर रणनीति पर बीजेपी की पैनी नजर-

चुनावी साल में बीजेपी कांग्रेस की हर रणनीति को भांपते चल रही है. 2014 आम चुनाव में राकेश सिंह ने कांग्रेस प्रत्यासी विवेक तंख्वा को भारी मतों से हराया था बाद में कांग्रेस ने विवेक तंख्वा को राज्यसभा भेज कर उनका कद बढ़ा दिया था. वर्तनाम में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के साथ आने से महाकौशल प्रान्त में कांग्रेस की सक्रियता से बड़ा फेरबदल हो सकता है इस दृष्टिकोण से भी बीजेपी पूरे घटनाक्रम को देख रही थी.

बीजेपी ने हर समीकरण पर किया मंथन-

दरअसल बीजेपी ने जातीय, सामाजिक, चुनावी सभी समीकरण के हिसाब से यह फैसला लिया है. मप्र. में कांग्रेस की तर्ज पर बीजेपी में भी क्षेत्रीय नेताओं की अच्छी दखल है लेकिन कांग्रेस की तरह बिखराव नहीं है एक जुटता है संगठन के नाम पर सब एक जुट हो जाते हैं.  प्रदेश की वर्तमान सरकार में आरक्षण का मुद्दा तूल पकड़ता जा रहा है ऐसे में अगर ब्राम्हण समाज से प्रदेश अध्यक्ष बना दिया जाता तो दलित समुदाय नाराज हो जाता इस वजह से गेंद नरोत्तम मिश्रा के पाले से कहीं और चली गयी. अगर नरेंद्र सिंह तोमर को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता तो उनसे केन्द्रीय मंत्री का पदभार वापस लिया जाता और उनके पास बहुत महत्वपूर्ण मंत्रालय हैं इस वजह से उन्हें भी ड्राप किया गया. विन्ध्य क्षेत्र से बीजेपी ने राज्यसभा सांसद और एक कद्दावर मंत्री पहले से बनाया हुआ है इस वजह से सभी विकल्पों में सबसे सटीक एक ऐसा चेहरा जो ग्रास रूट में कम करना जानता हो और विवादित न हो साथ ही राकेश सिंह  ओबीसी वर्ग से आते हैं तो ब्राम्हण और दलित के नाराज होने की संभावनाएं कम हो जाती हैं और पिछड़ा समाज का वोट बैंक साधने में भी दिक्कत नहीं होगी.

चुनौतियों भरा प्रदेश-

मप्र. में इस बार बीजेपी के चुनौतियाँ कम नहीं हैं. 15 साल से सत्ता में बैठा बीजेपी के खिलाफ एंटीइन्कमबेन्सी जैसी स्थिति निर्मित हो रही है ऐसे में आगामी चुनाव में चुनौतियां बहुत रहेगी. चुनावी साल में कार्यकर्ताओं और जनता के बीच संवाद भी एक बड़ी चुनौती होगी. आगामी विधानसभा चुनाव में समय बहुत कम बचा है ऐसे में पूरे प्रदेश के कार्यकर्ताओं तक पहुँच बनाना कठिन होगा. प्रदेश हर जाति हर समुदाय को साधने की जिम्मेदारी होगी.


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