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रीवा: सियासी समीकरण 1998 से 2018

ये रीवा है यहाँ की सियासी हवा थोड़ा अलग चलती है


-विन्ध्य की राजनीति में जगदीश चन्द्र जोशी,यमुना प्रसाद शास्त्री,श्रीनिवास तिवारी और अर्जुन सिंह जैसे दिग्गजों ने वैश्विक पटल पर अपना कीर्तिमान स्थापित किया था. विन्ध्य को अलग पहचान और राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी मजबूत दखल रखते थे विन्ध्य के ये कद्दावर नेता. विन्ध्य के साथ-साथ प्रदेश की राजनीति का केंद्र रहा है विन्ध्य क्षेत्र. विन्ध्य आजादी के बाद सोशलिस्ट पार्टी और फिर कांग्रेस की मजबूत भूमि रही है, लेकिन समय दर समय सियासी परिवर्तन हुए विन्ध्य में यानी समाजवादियों के गढ़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मजबूत दस्तक हुई और आज संघ ने विन्ध्य को मजबूती से कसकर पकड़ रखा है. दरअसल विन्ध्य और रीवा में 2003 से भगवा झंडा लहराया. विन्ध्य में सियासी समीकरण जातीय आधार पर भी खूब बनते आये हैं. ब्राम्हणों और ठाकुरों के समीकरण के साथ ओबीसी वर्ग की मजबूत पैठ के कारण विन्ध्य की कुछ सीटों पर बसपा का भी कब्ज़ा रहता है .

1998 में कैसी थी स्थिति-

अगर बात की जाये विन्ध्य क्षेत्र के रीवा जिले की तो 20 साल पहले का समीकरण कुछ यूँ था . 1998 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जिले में 2 सीटें मिली थी विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी मनगवां से जीते थे और सिरमौर से वर्तमान राज्यसभा सांसद राजमणि पटेल को जीत मिली थी. बीजेपी को भी 2 सीटों पर जीत मिली थी जिसमे त्योथर से रमाकांत तिवारी और देवतालाब से पंचुलाल प्रजापति जीते थे. बहुजन समाज पार्टी के खाते में भी 2 सीटें गयी थी .गुढ़ से विद्यावती पटेल और मऊगंज से आई.एम.पी वर्मा को जीत मिली थी .रीवा शहर की सीट पर महाराजा पुष्पराज सिंह निर्दलीय चुनाव में उतरे और उन्होंने उस समय अपना पहला चुनाव लड़ रहे वर्तमान विधायक और केबिनेट मंत्री राजेन्द्र शुक्ला को चुनाव में हरा दिया था. 1998 में जीत का अंतर कम होने के साथ ऐसे कयास लगने शुरू हो गये थे की अगली बार यानि 2003 में सत्ता परिवर्तन हो सकता हैं, क्युकी प्रदेशभर में हार-जीत का अंतर कम ही था.

2003 के विधानसभा चुनाव में जिले में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ हो गया.7 विधानसभा सीटों में कांग्रेस को एक भी सीट में जीत नहीं मिली. विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी भी अपनी सीट से चुनाव हार गये.7 सीटों में बीजेपी के खाते में 5 सीटें गयी जबकि बसपा को 1 सीट मिल और एक सीट पर सीपीएम को जीत मिली.बस यही वह साल था जब बीजेपी ने रीवा में अपनी मजबूत पकड़ बनायीं.

  • 2008 के विधानसभा चुनाव में एक नया विधानसभा क्षेत्र सेमरिया जुड़ गया. सेमरिया के जुड़ने से रीवा जिले में कुल 8 विधानसभा सीटें हो गयी. बीजेपी ने अपनी जीत पिछले चुनाव से 1 सीट और बढ़ा ली. 2008 में जिले में बीजेपी को 6 सीटों पर जीत मिली 1 सीट पर बसपा को जीत मिली और 1 सीट पर उमा भारती की पार्टी भारतीय जनशक्ति पार्टी को जीत मिली . हलाकि बाद में भारतीय जनशक्ति पार्टी का विलय बीजेपी में हो गया और बीजेपी की सीटों की संख्या 7 हो गयी.
  • 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 0 से अपना खाता खोला और जिले की 2 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली.बीजेपी को 5 सीटें मिली और बसपा के खाते एक सीट गयी.कुल मिलाकर 1998 जैसी स्थिति में कांग्रेस रीवा में आ गयी है लेकिन बीजेपी 2003 और 2008 की तुलना में 2013 में कुछ कमजोर हुई है. इस वर्ष चुनाव हैं और सरकार के खिलाफ एक एंटीइनकाम्बेंसी  जैसा माहौल भी बना हुआ है. दरसल बीजेपी ने 1998 के बाद ही रीवा में अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी थी और 2003 में उसमे संगठन की कसावट के चलते कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ कर दिया था.

आगे किसकी कैसी तैयारी -

2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की कोशिश होगी की वह अपना प्रदर्शन 2013 की तुलना में सुधारे. चुनावी साल में उठापटक का दौर भी शुरू है. 15 साल से सत्ता से दूर कांग्रेस इस मौके को अगर नहीं भुना पाई तो अब गुजारा नहीं हो पायेगा. जमीनी कार्यकर्ता अलग-थलग पड़ गया है. अब कांग्रेस फिर से अपने ग्रास रूट वर्कर को ढूढने निकली है. बीजेपी ने बकायदे संगठन की पकड़ को मजबूत करते हुए अपने घेरे को इतना मजबूत किया है की उसे तोड़ना आसान नहीं है.शीर्ष नेतृत्व रीवा को लेकर हमेशा से संशय में ही रहता है किसे जिम्मेदारी दी जाये किसे कमान सौंपी जाये. दरअसल स्थानीय मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने बीजेपी को जिले में मजबूत किया है.बीजेपी संगठन में असंतोष जैसी स्थिति कम ही रहती है.अगर मन में कुछ कसक रह भी जाये तो संगठन के नाम पर सब एक हो जाते हैं. समीकरण जाति आधारित भी खूब बन रहे हैं.हर विधानसभा क्षेत्र में उम्मीदवारों की लम्बी लिस्ट बनती जा रही है. बीजेपी,कांग्रेस,बसपा के साथ-साथ निर्दलीय उम्मीदवार भी ताल ठोक रहे हैं. जहाँ एक ओर बीजेपी ने बकायदे पूरी योजना के साथ काम करना शुरू किया है तो वहीँ दूसरी ओर कांग्रेस ने भी सेक्टर और मंडलम स्तर पर काम शुरू किया है. रीवा जिले की 8 विधानसभा सीटों पर हमेशा की तरह क्षेत्रीय समीकरण भी हावी रहेंगे. समाज, जाति, छवि स्थानीय जैसे मुद्दों पर भी जमकर वोटबैंक की राजनीति होती है.


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