115 साल पुरानी परंपरा का नही हुआ निर्वहन   किला परिसर में किया गया रावण का पुतला दहन

115 साल पुरानी परंपरा का नही हुआ निर्वहन   किला परिसर में किया गया रावण का पुतला दहन

देशभर में नवरात्री के दसहरा पर्व का त्यौहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया यह त्यौहार नवरात्रि के 10वें दिन ही मनाया जाता है दशहरा को बुराई पर अच्छाई की जीत का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। हर वर्ष यह पर्व आश्विन मास शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन मनाया जाता है। पूरे देश में यह परंपरा है कि विजयादशी के दिन रावण के पुतले को फूंका जाता है।इस साल कोरोना को देखते हुए त्यौहार का जश्न कुछ कम ही देखने को मिला। लेकिन इस वर्षे कई क्षेत्रों में 9 वें दिन ही रावन का पुतला दहन कार्यक्रम मनाया गया आपको बता दे की इस पर्व को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग ढंग से मनाया जाता है।  लेकिन कोरोना संक्रमण के चलते देश में मनाये जा रहे इस त्यौहार को फीका कर दिया है इसी कड़ी में रीवा में भी सालों से चली आ रही परंपरा कोरोना महामारी के कारण टूट गई इस बार बुराई के प्रतीक रावण के 9 सिर वाले पुतले का दहन किया गया जबकि अब तक पौराणिक मान्यताओं के अनुसार 10 सिर वाले रावण के पुतले का दहन होता था कोरोना महामारी के कारण इस बार एनसीसी मैदान की वजह किला परिसर में ही रावन के पुतला को दहन किया गया  किला में मनाये जा रहे प्रतीकात्मक कार्यक्रम में महज कुछ सैकडा लोग ही शामिल हुए इसमें भी आमजन का प्रवेश किला परिसर में वर्जित रहा कार्यक्रम कोरोना काल के चलते नगर की 120 साल पुरानी चल रही समारोह परंपरा का निर्वहन नहीं हुआ आपको बता दे की पिछले कुछ सालों से उपरहटी स्तिथ किला परिसर से चल समारोह निकलकर एनसीसी मैदान तक आता था शहर की सभी झांकियां किला में एकत्रित होती थी फिर सवारी के पीछे सभी झांकियां चलते हुए एनसीसी ग्राउंड पहुंचती थी उसके बाद रावण दहन होता था लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ कोरोना संक्रमण के कारण सब कुछ फीका नजर आया लेकिन दशहरे का पर्व धूम धाम से मनाया गया  आपको बता दे की इस साल मेघनाद व कुंभकर्ण का पुतला तैयार  नहीं किया गया जिला प्रशासन ने समारोह में केवल 200 लोगों के शामिल होने की अनुमति दी थी इतना ही नहीं कलेक्टर इलैयारजा टी ने  किले  का भ्रमण कर किला समित से चर्चा की और वहां पर पहुचने वाले लोगो को सोशल डिस्टेंनसिंग एवं मास्क को लेकर ध्यान देने की बात कही  जानकार बताते हैं कि किला में गद्दी पूजन की परंपरा 400 साल से भी पुरानी है किले में यह परंपरा 1617 वर्षों से निरंतर चली आ रही है पहली बार गद्दी पूजन बघेल वंस के 22 वे  महाराजा विक्रमादित्य सिंह जूदेव ने किया था इसके बाद से यह परंपरा कायम है राजगद्दी में भगवान राजाधिराज को विराजित करने की परंपरा सतत चली आ रही  है यहां कोई भी राजा गद्दी पर नहीं बैठे हैं जानकर बताते है कि बांधवगढ़ से ही यह परंपरा का उदय हुआ है कहते हैं कि विन्ध्य का इलाका लक्ष्मण का आता है जो भगवान राम को आदर्श मानते थे श्री राम की ही प्रतिमा को गद्दी पर विराजमान करते थे और सेवक की तरह कार्य करते थे भगवान श्री राम के अनुज लक्ष्मण को कुल देवता के रूप में पूजा जाता है दशहरा के दिन नीलकंठ का दर्शन काफी शुभ माना जाता है यही वजह है कि पूजन के साथ ही नीलकंठ के दर्शन की भी परंपरा रही जो आज भी कायम है विजयदशमी के अवसर पर किला में गद्दी पूजन समारोह के दौरान विंध्य क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों को सम्मानित किए जाने की परंपरा रही है इस बार भी 2 लोगों को सम्मानित किया गया इसमें कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले सतना जिले के बाबूलाल दाहिया एवं कोरोना मरीजों के इलाज में चिकित्सकों सहित अन्य स्टाफ की सेवाओं के सम्मान में डॉक्टर मनोज इंदुलकर को सम्मानित किया गया गौरतलब है कि बाबूलाल दया को पद्मश्री अवार्ड भी मिल चुका है धान की 200 से ज्यादा बिराटिया उन्होंने संरक्षित इतिहास के अनुसार रीवा में दशहरा की शुरुआत 1618 में हुई थी किला परिसर में ही रावण का दहन होता था यह क्रम 1905 तक किला परिसर में ही चलता रहा इसके बाद महाराजा वेंकट रमण सिंह के जमाने में स्थान परिवर्तन हुआ और रावण का दहन कार्यक्रम बिछिया में होने लगा बाद में स्थान का परिवर्तन  हुआ और आईटीआई मैदान में शुरू हुआ इसके बाद एनसीसी ग्राउंड में होने लगा जो निरंतर आज भी मनाया जा रहा है लेकिन 115 साल बाद इस बार कोरोना संक्रमण के चलते पुनः किला परिसर में रावण का दहन किया गया हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी दसहरा का त्यौहार हर्ष और उल्लाश के साथ मनाया गया कोरोना सक्रमण काल में जहा आर्थिक गतिविधियों के साथ साथ आम जन जीवन भी प्रभित हुआ तो वहीँ सामाजिक परम्परा और भारत के संस्कृत सभ्यता को जिवंत रखते हुए इसी कोरोना काल में दसहरा का त्यौहार हर्ष उल्लाश के साथ मनाया गया और रीवा किला में दशानन रावन का पुतला दहन करते हुए सदियों से चली आ रही परम्पराओं का पालन किया गया