सूचना आयुक्त मप्र.का ऐलान अब एप्पलीकेशन के माध्यम से सूचना आयोग उपलब्ध करवाएगा जानकारी

सूचना आयुक्त मप्र.का ऐलान अब एप्पलीकेशन के माध्यम से सूचना आयोग उपलब्ध करवाएगा जानकारी

रीवा शहडोल संभाग के RTI कार्यकर्ताओं के लिए आयोग का फरमान

अब एप्पलीकेशन के माध्यम से आयोग उपलब्ध  करवाएगा जानकारी - सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह

   पंजीयक सहकारिता सूचना के अधिकार के दायरे के अंदर - सूचना आयुक्त राहुल सिंह

आयुक्त और सामाजिक कार्यकर्ताओं का संबंध अब और प्रगाढ़ता की ओर बढ़ता जा रहा है। आरटीआई कानून के जरिए भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने के लिए पूरे देश की टीम रविवार के दिन ज़ूम मीटिंग के द्वारा अलग अलग विषयों पर जानकारों से जानकारी हासिल करने के लिए चार से पांच घंटे मीटिंग करती है। इसी तारतम्य में आरटीआई में अपील कब और कैसे करें विषय पर ज़ूम मीटिंग वेबीनार का आयोजन मध्य प्रदेश सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। जिसमें पूर्व सीआईसी श्री शैलेश गांधी एवं एसआईसी आत्मदीप एवं आरटीआई एक्टिविस्ट भास्कर प्रभु विशिष्ट अतिथि रहे। एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी के संयोजन एवं प्रबंधन और आयोग की मदद से हर रविवार सुबह 11:00 बजे से मीटिंग प्रारंभ होती है जिसमें पूरे देश से सूचना के क्षेत्र के जुड़े हुए कार्यकर्ता अपनी अपनी बातें, सुझाव, प्रश्न रखते हैं और विशेषज्ञों जैसे सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह, पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री शैलेश गांधी, पूर्व मध्य प्रदेश सूचना आयुक्त श्री आत्मदीप एवं माहिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक श्री भास्कर प्रभु तथा अन्य वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, आरटीआई एक्टिविस्ट आदि लोगों से अपनी बातें साझा करते हैं और समाधान पाते हैं।3 सितंबर 2020 को आयोजित जूम मीटिंग वेबीनार के दौरान कुछ आवेदकों ने प्रश्न किया कि क्या प्रथम अपीलीय अधिकारी अथवा सूचना आयोग द्वारा आवेदक की बार-बार पेशी करवाना कानूनन सही है? इस पर जवाब देते हुए पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री शैलेश गांधी ने कहा की सूचना के अधिकार अधिनियम की मंशा स्पष्ट है और वह यह है कि ज्यादातर जानकारियां आवेदकों को और देश के नागरिकों को बिना किसी मेहनत के सुलभ हो सके लेकिन आज 15 वर्ष बाद भी जानकारियां सुलभ न हो पाना कानून की असफलता को दर्शाता है ऐसे में यह आवश्यक है की धारा 4 के तहत ज्यादातर जानकारियां पब्लिक डोमेन में साझा की जाए। जहां तक सवाल प्रथम अपीलीय अधिकारी अथवा सूचना आयोग के द्वारा आवेदकों के पेशी करवाने के संदर्भ में है तो आरटीआई कानून में यह कहीं भी नहीं लिखा है कि आवेदकों की पेशी करवाई जाए और यह कानून के हिसाब से बाध्यकारी नही है। लेकिन सुनवाई के दौरान आवेदक भी अपने पक्ष को बेहतर ढंग से रख सके इसलिए आवेदकों को भी अमूमन सुनवाई में तलब किया जाता है लेकिन कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है और जो भी आवेदक नियमानुसार जानकारी चाहते हैं उन्हें तत्काल उपलब्ध करवाई जानी चाहिए और यदि जानकारी धारा 4 की श्रेणी में आती है तो ऐसी समस्त जानकारियां पब्लिक डोमेन में साझा की जानी चाहिए।

पंजीयक सहकारिता सूचना के अधिकार के दायरे के अंदर - सूचना आयुक्त राहुल सिंह

रीवा से आवेदक ललित मिश्रा एवं राकेश कुमार तिवारी के द्वारा सहकारिता विभाग से जुड़े हुए प्रश्न एक बार पुनः पूछे गए जिसमें सहकारिता विभाग का यह कहना कि सूचना का अधिकार कानून उनके कार्यालय में लागू नहीं होता है। इस विषय का जवाब देते हुए मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने कहा कि सहकारिता विभाग में सूचना के अधिकार का अधिनियम लागू होता है और लोक सूचना अधिकारी यह कहकर अपने आप को बचा नहीं सकते। श्री सिंह ने आगे कहा कि आवेदक आरटीआई का आवेदन उप पंजीयक और संयुक्त पंजीयक सहकारिता विभाग कार्यालय में दें और वहां से जानकारी प्राप्त करें क्योंकि यह सरकारी कार्यालय हैं और सरकार द्वारा वित्त पोषित है। यदि कोई दस्तावेज चाहे गए हैं जिनका संबंध डीआर अथवा जेआर कार्यालय से है तो निश्चित तौर पर जेआर एवं डीआर को वह दस्तावेज और उससे जुड़ी हुई जानकारी उपलब्ध करानी पड़ेगी।

यदि लोक सूचना अधिकारी प्रथम अपीलीय अधिकारी का नाम ना बताएं तो आवेदक क्या करें?

आरटीआई से जुड़ा हुआ एक बहुत ही सामान्य प्रश्न ज्यादातर उपस्थित श्रोताओं के द्वारा पूछा गया कि कई बार ऐसा होता है कि लोक सूचना अधिकारी न तो सूचना के अधिकार आवेदन का जवाब देते हैं और न ही अपने प्रथम अपीलीय अधिकारी का नाम पद और पता बताते हैं ऐसी स्थिति में आवेदक क्या करें? इस बात का जवाब देते हुए लगभग उपस्थित सभी विशेषज्ञों श्री राहुल सिंह, श्री शैलेश गांधी, श्री आत्मदीप एवं श्री भास्कर प्रभु ने कहा कि इन स्थितियों में आवेदकों को 30 दिन का समय व्यतीत होने के तत्काल बाद प्रथम अपीलीय अधिकारी केयर आफ लोक सूचना अधिकारी और उसी कार्यालय के नाम जहां पर आरटीआई आवेदन दायर किया गया था पते पर भेज दे। आगे यह उसी लोक सूचना अधिकारी की जिम्मेदारी होगी कि वह अपने प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास तक वह आवेदन फॉरवर्ड करें और आवेदक को चाही गई जानकारी उपलब्ध कराएं। इसमें भी आवेदकों को जानकारी उपलब्ध न हो पाए तो आवेदक धारा 18 एवं धारा 19(3) के तहत सूचना आयोग में शिकायत एवं द्वितीय अपील प्रस्तुत कर सकते हैं जिसके बाद आयोग संज्ञान लेगा और लोक सूचना अधिकारी एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी दोनों पर कार्यवाही करेगा।

 यदि लोक सूचना अधिकारी आईपीओ वापस कर दे तो क्या करें?

जूम मीटिंग के दौरान गिरिडीह झारखंड से सुनील खंडेलवाल ने कहा कि एक बार लोक सूचना अधिकारी के द्वारा उनका इंडियन पोस्टल आर्डर वापस कर दिया गया था और बताया गया था कि हमारे यहां लेखाधिकारी नहीं है और जन सूचना अधिकारी हैं अतः पोस्टल आर्डर जन सूचना अधिकारी के नाम से भेजें। इसका जवाब देते हुए सूचना आयुक्तों ने एवं विशेषज्ञों ने बताया कि आरटीआई कानून में पोस्टल आर्डर लेखा अधिकारी के नाम पर दिया जाता है अतः वही मान्य है और कोई भी लोक सूचना अधिकारी अपनी मर्जी से कोई अन्य अकाउंट नहीं बना सकता और उसे लेखा अधिकारी के नाम से पोस्टल आर्डर एड्रेस किया हुआ लेना ही पड़ेगा और यदि नहीं लेता तो इस बात की शिकायत सूचना आयोग में धारा 18 के तहत की जानी चाहिए जिसके बाद आयोग संबंधित लोक सूचना अधिकारी के ऊपर अनुशासनात्मक एवं दंडात्मक कार्यवाही करेगा।

जल्द ही ऐप के माध्यम से आयोग उपलब्ध करवाएगा जानकारी - सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह

उधर मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग में कुछ नए एक्सपेरिमेंट भी किए जा रहे हैं जिसमें नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के वालंटियर और इंटरनेट के माध्यम से कुछ एप का निर्माण किया गया है जिसके माध्यम से आयोग में और विशेषकर रीवा और शहडोल संभाग में प्रकरणों को जल्दी ही एप में अपलोड और लिंक किया जाएगा और उसकी लिंक सीधे हाईकोर्ट जबलपुर के प्रकरणों से होगी। इस व्यवस्था में अब किस लोक सूचना अधिकारी को कितनी फाइन लगी है और उसने फाइन क्यों समय पर जमा नहीं किया इसकी जानकारी इस एप के माध्यम से उपलब्ध होगी और साथ में अपीलार्थियों को उनके प्रकरण की जानकारी मोबाइल नंबर पर व्हाट्सएप के माध्यम से मिलेगी और साथ में उनके ईमेल पर भी भेजी जाएगी। इसी प्रकार एक पब्लिक ग्रीवेंस रिड्रेसल सिस्टम बनाया जा रहा है जिसमें सप्ताह के सातों दिन और 24 घंटे यह सुविधा उपलब्ध होगी जिसमें आवेदक अपनी क्वेरी रख सकेंगे और 24 घंटे के अंदर उनको उनकी क्वेरी का जवाब मिल जाएगा।

प्राइवेट बैंक की जानकारी आरबीआई से ले सकते हैं - श्री शैलेश गांधी

राजस्थान जयपुर से एडवोकेट केशव पारीक ने प्रश्न किया कि क्या प्राइवेट बैंक पर आरटीआई लगाई जा सकती है और क्या आरबीआई के माध्यम से जानकारी मांगी जा सकती है? इसका जवाब देते हुए पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री शैलेश गांधी ने बताया कि प्राइवेट बैंक जो जानकारी भारतीय रिजर्व बैंक से साझा करते हैं वह जानकारी आरबीआई में आरटीआई लगाकर प्राप्त की जा सकती है लेकिन किसी भी प्राइवेट बैंक में लोक सूचना अधिकारी का कोई पद नहीं होता है अतः प्राइवेट बैंक में आरटीआई नहीं लगाई जा सकती है। वहीं मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने बताया कि किसी भी बैंक में किसी भी व्यक्ति के पर्सनल बैंक अकाउंट की जानकारी नहीं ली जा सकती क्योंकि यह तीसरे पक्ष की जानकारी होती है और इसमें धारा 8 की उप धाराओं का उल्लंघन माना जाता है।

यदि आयोग के आदेश की अवमानना हुई है तो आयोग को अपीलार्थी की शिकायत का इंतजार नहीं करना चाहिए - पूर्व सूचना आयुक्त आत्मदीप


    उधर अपील से जुड़े हुए कुछ प्रकरणों के सवालों के जवाब में पूर्व मध्य प्रदेश सूचना आयुक्त श्री आत्मदीप ने कहा कि अमूमन यह देखा गया है कि सूचना आयोग के आदेश की अवमानना होती है और आयोग के आदेश के उपरांत भी समय पर आवेदकों को जानकारी उपलब्ध नहीं करवाई जाती है। इसके कंप्लायंस के लिए स्ट्रिक्ट एक्शन की आवश्यकता होती है ऐसे में आयोग को चाहिए कि वह अपीलार्थी की शिकायत का इंतजार बिल्कुल ही न करें और मात्र एक सूचना पर ही कार्यवाही करें और यदि लोक सूचना अधिकारी द्वारा जानकारी आवेदक को उपलब्ध नहीं करवाई गई है और कंप्लायंस नहीं हुआ है इस स्थिति में लोक सूचना अधिकारी के ऊपर सख्त से सख्त जुर्माना लगाया जाना चाहिए। श्री आत्मदीप ने बताया कि यह अक्सर होता है कि लोक सूचना अधिकारियों द्वारा न तो जुर्माने की राशि जमा की जाती है और आयोग के आदेश की भी अवमानना की जाती है जिससे आदेश के उपरांत भी आवेदकों को जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाती है। श्री आत्मदीप ने कहा कि आयोग को चाहिए जुर्माने की राशि जमा करवाने के सख्त नियम बनाएं।


  अपने समय के एक प्रकरण का हवाला देते हुए पूर्व मध्य प्रदेश सूचना आयुक्त श्री आत्मदीप ने बताया कि एक शिवपुरी से अपील आई थी जिसमें अपीलार्थी ने काफी बृहद जानकारी मांगी थी जिसमें कोर्ट केस की जानकारी पिछले 10-20 वर्षों के पत्राचार की जानकारी भूमियों के नामांतरण, खसरे की जानकारी, उनके आदेशों की जानकारी और अन्य काफी बृहद जानकारी सम्मिलित थी जिसको आयोग द्वारा यद्यपि निरस्त तो नहीं किया गया लेकिन यह आदेश दिया गया कि आवेदक सभी संबंधित राजस्व जिलों में जाकर अभिलेखागार का अवलोकन कर लें और स्वतंत्रता प्राप्ति से अब तक के समय के दस्तावेज देखकर जो जानकारी उन्हें चाहिए वह जानकारी प्राप्त करने कर ले।

कारण बताओ नोटिस से आवेदकों को क्या फायदा? आवेदक का जो खर्च होता है उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

    भोपाल से गोविंद देशवारी ने पूछा कि अक्सर आयोग शो कॉज नोटिस जारी करता है जिसमें लोक सूचना अधिकारी एवं अपीलीय अधिकारी के विरुद्ध नोटिस जारी कर उन्हें सुनवाई में बुलाया जाता है लेकिन इस पूरी प्रक्रिया से आवेदक को किस प्रकार से फायदा होता है? इसका जवाब देते हुए सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने बताया की कारण बताओ सूचना पत्र जारी करना एवं आगे की कार्यवाही के लिए जवाब तलब करना सूचना के अधिकार अधिनियम की प्रक्रिया में सम्मिलित है जिसके आधार पर संबंधित दोषी लोक सूचना अधिकारियों के ऊपर जुर्माने की कार्यवाही की जाती है। श्री देशवारी ने आगे पूछा कि जहां लोक सूचना अधिकारी एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी सरकारी खर्चे और टीए डीए से भोपाल अथवा नई दिल्ली का दौरा करते हैं वहीं आवेदक को परेशान होकर अपने जेब खर्च से फोटो कॉपी, स्पीड पोस्ट, ट्रेन का खर्चा आदि वहन करना पड़ता है और साथ में मानसिक टेंशन होता है वह अलग होता है ऐसे में आयोग आवेदकों को हर्जाना क्यों नहीं दिलवाता? इसका जवाब देते हुए श्री राहुल सिंह ने कहा कि यदि आवेदक यह प्रमाण उपलब्ध करवा दें कि उनका खर्चा हुआ है अथवा जानकारी न मिलने की वजह से उन्हें अपना जॉब नहीं मिला है अथवा उनकी संपत्ति का नुकसान हुआ है अथवा उनका कोई टेंडर खारिज हुआ है अथवा उनके व्यापार में कोई क्षति हुई है आदि तो इस स्थिति में आयोग निश्चित तौर पर स्ट्रिक्ट एक्शन लेगा और संबंधित आवेदक को हर्जाना भी उपलब्ध करवाएगा।

यदि लोक सूचना अधिकारी अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारी का परफॉर्मेंस ठीक न हो तो उसके विभागाध्यक्ष को शिकायत करें - श्री भास्कर प्रभु


   जब बात लोक सूचना अधिकारियों और प्रथम अपीलीय अधिकारियों के परफॉर्मेंस कि आई तो इस विषय पर अपना वक्तव्य रखते हुए माहिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक भास्कर प्रभु ने कहा कि यह एक चिंता का विषय है और यद्यपि लोक सूचना अधिकारी अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारी का निर्धारण उसी विभाग का अध्यक्ष करता है लेकिन सही तरीके से लोक सूचना अधिकारियों अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारियों का चुनाव नहीं करने से काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है जिसकी वजह से सूचना का अधिकार अधिनियम अपनी मंशा के अनुरूप कार्य नहीं कर पा रहा है। इस विषय पर प्रकाश डालते हुए श्री प्रभु ने कहा कि यदि लोक सूचना अधिकारी अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारी कानून की मंशा के अनुरूप परफारमेंस न कर रहे हो इस स्थिति में आवेदकों को चाहिए कि वह विभागाध्यक्ष के साथ-साथ सूचना आयोग में भी शिकायत करें। हमेशा सूचना आयोग में शिकायत करने से बेहतर होता है कि अन्य माध्यम तलाशे जाएं और लोक सूचना अधिकारी अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारी के विरुद्ध शिकायतें संबंधित विभागाध्यक्ष से लेकर सीएम कार्यालय चीफ सेक्रेटरी एवं सामान्य प्रशासन विभाग आदि में करें जिससे कार्यवाही का दबाव बने और लोक सूचना अधिकारी तथा प्रथम अपीलीय अधिकारी सही तरीके से कार्य करना प्रारंभ करें।

नए मामलों में आयोग प्रथम अपीलीय अधिकारी पर भी करेगा कार्यवाही - सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह


   प्रथम अपीलीय अधिकारी के द्वारा समय पर और अपनी शक्ति के अनुसार कार्यवाही न करने के कारण लोक सूचना का अधिकार का कानून काफी कमजोर होता जा रहा है जिसकी वजह से आवेदकों को सीधे सूचना आयोग में अपील करनी पड़ रही है और आलम यह है कि जो काम लोक सूचना अधिकारी अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारी को करना चाहिए वह सूचना आयोग कर रहा है। ऐसे में मध्यप्रदेश के स्तर पर हो रहे बदलाव के मद्देनजर अपनी बात रखते हुए सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने बताया कि वह प्रथम अपीलीय अधिकारियों पर बहुत ही जल्दी शिकंजा कसने वाले हैं और यदि कोई प्रथम अपीलीय अधिकारी कानून की मंशा के अनुरूप समय पर अपील का समुचित निराकरण नहीं करता है ऐसे में वह सिविल सेवा अधिनियम के उल्लंघन का भी दोषी माना जाएगा और साथ में लोक सेवा गारंटी अधिनियम के साथ कंडक्ट रूल का भी उल्लंघन करता हुआ माना जाएगा। इसमें आयोग बहुत ही जल्दी ऐसे समस्त प्रथम अपीलीय अधिकारियों के ऊपर कार्यवाही करेगा जिससे लोक सूचना के अधिकार को जन-जन तक पहुंचाने में और मजबूत बनाने में मदद हो सके।

क्या सूचना आयोग के एक निर्णय को कोई अन्य सूचना आयुक्त बदल सकता है?


    जूम मीटिंग के दौरान एक आवेदक ने पूछा की सूचना आयोग ने उनके पक्ष में निर्णय दिया था और उन्हें चाही गई जानकारी उपलब्ध करवाए जाने के लिए संबंधित लोक सूचना अधिकारी को निर्देशित किया था। लेकिन जब लोक सूचना अधिकारी ने आयोग के आदेश की अवमानना की और समय पर जानकारी उपलब्ध नहीं करवाई तब उन्होंने पुनः सूचना आयोग में शिकायत प्रस्तुत की जिस पर कार्यवाही करते हुए दूसरे सूचना आयुक्त ने उनके विरुद्ध निर्णय दे दिया और जानकारी न देने के लिए आदेशित कर दिया। इस पर आवेदक ने जानना चाहा कि चूंकि आयोग का निर्णय बाध्यकारी होता है इसलिए क्या एक निर्णय दिए जाने के बाद कोई अन्य सूचना आयुक्त उसी निर्णय को पलट सकता है? इस पर सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि यदि दूसरे सूचना आयुक्त को यह लगता है कि पहला वाला निर्णय सही नहीं था तो निर्णय बदला जा सकता है। इस बात पर भास्कर प्रभु ने कहा कि आवेदक को यदि ऐसा लगता है कि दोनों निर्णय परस्पर विरोधाभासी है और आवेदक निर्णय से संतुष्ट नहीं है उस स्थिति में आवेदक दोनों निर्णय को संबंधित हाई कोर्ट में चैलेंज कर सकता है।

सरकारी कार्यालयों में सिटीजन चार्टर नियमावली के अनुसार क्यों नहीं लगाए जाते?


    जूम मीटिंग के दौरान पत्रिका समूह के वरिष्ठ पत्रकार मृगेंद्र सिंह ने पूछा कि सरकारी कार्यालयों में सिटीजन चार्टर की क्या नियमावली है? सभी कार्यालयों में नियमानुसार सिटीजन चार्टर लगाए जाने चाहिए जिसमें धारा 4 के तहत जो जानकारी साझा की जाती है वह उपलब्ध होनी चाहिए और साथ में लोक सूचना अधिकारी प्रथम अपीलीय अधिकारी आदि के मोबाइल नंबर नाम पर सभी साझा किए जाने चाहिए पर ऐसा होता नहीं है। इस पर जवाब देते हुए सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने बताया कि यह आवश्यक नहीं है कि हर बात को लेकर सूचना आयोग में ही शिकायत की जाए। इस बात की शिकायत संबंधित विभागाध्यक्ष को भी की जा सकती है और यदि वह विभागाध्यक्ष कार्यवाही न करें उस स्थिति में मामले को धारा 18 की शिकायत के तहत संबंधित सूचना आयोग में लाया जा सकता है और तब सूचना आयोग निश्चित ही इस पर कार्यवाही करेगा।

हम धारा 4 के 17 पॉइंट्स मैनुअल की जानकारी संबंधित लोक सूचना अधिकारी से मांग रहे हैं - श्री राहुल सिंह


   इस बीच सूचना का अधिकार अधिनियम मध्यप्रदेश में कैसे बेहतर ढंग से प्रभावी हो इस पर नित नए एक्सपेरिमेंट किए जा रहे हैं। क्योंकि सभी कार्यालयों में लोक सूचना अधिकारी धारा 4 के तहत 17 पॉइंट मैनुअल नहीं रखते हैं इस बात को लेकर सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने बताया कि अब वह सभी लोग सूचना अधिकारियों से यह जानकारी मांग रहे हैं कि क्या उनके यहां धारा 4 के तहत 17 पॉइंट मैनुअल उपलब्ध हैं? यदि हां तो यह जानकारी उपलब्ध करवाएं और यदि नहीं है तो तत्काल धारा 4 के तहत 17 पॉइंट मैनुअल की जानकारी अपने विभाग में साझा करें जिससे आवेदकों को जब चाहे तब वह जानकारी मिल जाए और उन्हें किसी भी प्रकार से कोई दिक्कत का सामना न करना पड़े।


   *वेबीनार में यह कार्यकर्ता रहे सम्मिलित*


   दिनांक 13 सितंबर 2020 को सुबह 11:00 बजे से दोपहर 2:00 बजे तक आयोजित ज़ूम मीटिंग वेबीनार के दौरान लगभग एक सैकड़ा जिज्ञासु और कार्यकर्ता जुड़ें और अपनी समस्याओं का समाधान पाया। कार्यक्रम में प्रमुख पार्टिसिपेंट्स में अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा एवं शिवेंद्र मिश्रा, एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी एवं सर्वेश सोनी, रीवा से प्रदीप उपाध्याय, सुरेश उपाध्याय, राकेश तिवारी, दीपू सिंह, ललित मिश्रा, आदित्य पांडे, पुष्पराज तिवारी, मदन गोपाल तिवारी, राजस्थान से राम खिलाड़ी मीणा सपना मीणा, केशव पारीक, झारखंड से ए के सिंह, सुनील खंडेलवाल, गोरखपुर यूपी से प्रदीप सिंह, नई दिल्ली से अक्षय गोस्वामी, मध्य प्रदेश से शैलेंद्र सिंह चौहान, नई दिल्ली से अशोक गोयल, जबलपुर से विजय पांडे, भोपाल से गोविंद देशवारी, मनोज सिंघल, मनीष दुबे, शिवेंद्र शुक्ला, अनिमेष पटेल, कृष्ण कुमार पटेल, मानव रस्सीवाला, प्रियेश प्पांडे, अनिल सिंह,  बृजेंद्र चतुर्वेदी, पत्रिका से मृगेंद्र सिंह, दैनिक जागरण से देवेंद्र सिंह आदि कार्यकर्ता सहभागी रहे।