ध्यान रहे कल पूरे दिन शिक्षकों को राष्ट्र निर्माता कहना है।

शिक्षा के बदलते स्वरूप में आज का समाज शिक्षित होता हुआ

ध्यान रहे कल पूरे दिन शिक्षकों को राष्ट्र निर्माता कहना है।

जिसका इंतजार था आखिर वह दिन आ ही गया आज 5 सितंबर शिक्षक दिवस आ ही गया यानी भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती। आज के दिन पूरे राष्ट्र में शिक्षकों को राष्ट्र निर्माता के नाम से संबोधित किया जाएगा भले ही अगले दिन यानी 6सितंबर को ऐसा हरगिज न कहा जाए।वस्तुतः शिक्षकीय पेशा अब मजबूरी का नाम बनता जा रहा है। कहीं न कहीं कुछ नहीं बहुत कुछ गड़बड़ हो रहा है।जिनमे शिक्षकीय गुण , निष्ठा, आदर्श और समर्पण नहीं है वो शिक्षकीय पेशे में आ रहे हैं मजे से ठेकेदारी करके अन्य व्यवसाय से पैसे कमा रहे हैं विद्यालयों में पढ़ाने के लिए उन्होंने अपने/खुद से न्यूनतम मानदेय पर शिक्षक नियुक्त कर रखे हैं।उनके बच्चे प्राइवेट पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं वो सरकारी स्कूलों में शिक्षक हैं वेतन भी सरकार से लेते हैं पर पानी पी पी कर सरकारी स्कूलों और उसके प्रशासन को कोसते हैं।वास्तव में उनके लिए मास्टरी साइड बिजनेस है।और एक ओर वो शिक्षक हैं जो शिक्षक बनने के लिए ही पैदा हुए हैं।शिक्षकीय आदर्शो के मानकों पर अपने आप को खरा उतारने की अनवरत कोशिश में लगे रहते हैं सरकारी ढुलमुल रवैया को सहते हैं सिस्टम से जूझते हैं , उपेक्षाओं को महसूस करते हैं, पर वे शिक्षक विद्यार्थियों के भविष्य के निर्माण को गढ़ते रहते हैं। महामारी के दौर में एक और वह शिक्षक थे जिन्होंने लगभग 2 साल स्कूल के मुंह ना देखे और ना ही उनके विद्यार्थी किस हाल में हैं उनके विषय में कोई चिंता की लेकिन एक और वह भी शिक्षक थे जो अनवरत टेक्नोलॉजी का उपयोग करके विद्यार्थियों के संपर्क में रहे जितना उन से बन पड़ा उन्होंने डिजिटल माध्यम से आभासी शिक्षण कार्य भी किया। अब प्रश्न यह उठता है कि जब हमारी सरकारें शिक्षकों को पुरस्कृत करने के लिए भी उन्हीं से आवेदन करवाती हैं। सरकारी तंत्र को यह देखने तक की फुर्सत नहीं है कि वास्तव में ग्रास रूट पर कौन शिक्षक बेहतर कार्य कर रहे हैं ।उनके अच्छे कार्यों के लिए उनको प्रशंसा या पुरस्कार क्या सरकारों को ढूंढ कर नहीं देना चाहिए। एक शिक्षक होने के नाते इस लेखक ने प्रत्येक वर्ष अपनी कक्षा के विद्यार्थियों के बीच एक सर्वे,अनुसंधान किया जब उनसे उनके भविष्य में क्या बनना चाहते हैं के बारे में पूछा तो लगभग 60 में से 1 या 2 बच्चों ने ही शिक्षक बनना स्वीकार किया यहां तक कि ऐसे विद्यार्थी जिनके माता या पिता खुद सरकारी स्कूलों में शिक्षक हैं वह छात्र भी खुद शिक्षक नहीं बनना चाहते हैं। आप खुद ही सोच लीजिए कि आने वाले समय में बेहतरीन, उम्दा और अपने विषय के ज्ञाता शिक्षकों की कितनी कमी होने जा रही है, क्योंकि एक डॉक्टर का बच्चा तो डॉक्टर बनना चाहता है इंजीनियर का बच्चा इंजीनियर बनना चाहता है, नेता का बेटा खुद नेता होना चाहता है,लेकिन विडंबना है कि एक शिक्षक का बेटा कदापि शिक्षक नहीं होना चाहता। इस शिक्षकीय पेशे के प्रति आज मेधावी उत्साही युवाओं में अभिरुचि ही कम नहीं हुई है बल्कि निष्ठा और सम्मान भी घटा है।स्वप्नजीवी कर्तव्य परायण युवकों का रुझान भी कम हुआ है। आजादी के बाद से ही हमारी सरकारों को इतनी सरल बात ही समझ में नहीं आई कि जिस प्रकार से एक गाय से दूध उसको लाड, प्यार और पुचकार, देकर उसे सहला कर ही निकाला जा सकता है उसी प्रकार से एक शिक्षक से उसके ज्ञान को उसको तनाव रहित करके ही विद्यार्थियों को दिलवाया जा सकता है शिक्षक जब तक ज्ञान बताना ना चाहे उससे कैसे पढ़वाया जा सकता है।लेकिन सरकारों ने शायद आजादी के बाद सबसे अधिक तनाव शिक्षको को ही दिया है , आजादी के बाद से ही सर्वाधिक प्रयोग शिक्षा को लेकर ही किए गए हैं ।जिससे ना केवल इस पद की गरिमा घटी है बल्कि जब "कुछ ना बन पाए" तो शिक्षक बन जाओ की कहावत चरितार्थ हुई है। एक मजेदार बात यह है कि युवा स्नातक करने के बाद विकल्प के रूप में बी एड करते हैं, ताकि अगर प्रशासनिक क्षेत्र में ना जा पाए, इंजीनियर डॉक्टर ना बन पाए, तो वह अंत में शिक्षक ही बन जाएं अंतिम विकल्प उनका शिक्षक होता है। इस शिक्षकीय पेशे को स्वीकार करने में मरण उनकी हुई जो वास्तव में दिल से, दिमाग से, शिक्षक ही बनना चाहते थे जो शिक्षकीय पेशे के लिए ही अपने आप को समर्पित करते हैं वह और कोई अन्य व्यवसाय नहीं करते। समय के साथ-साथ सरकारी तंत्र को देखकर सरकारी व्यवस्थाओं को देखकर उनके मन में भी धीरे-धीरे इस पेशे के प्रति वितृष्णा ही पैदा होती है। आज हमारा अभिभावक भी सरकारी स्कूलों में बच्चों को एडमिशन दिला कर पूरी तरह से बच्चों को ट्यूशन पर निर्भर करा देता है। सरकारी स्कूलों में शिक्षक तो अच्छे विद्यार्थियों को तरस रहे हैं कि वह आए तो उनको वह अपने ज्ञान से सिंचित करें।अगर सरकारें सिर्फ इतना कर लें कि उन शिक्षकों को खोज खोज कर पुरस्कृत करना शुरू कर दें जो तन मन धन से शिक्षकीय निष्ठा आदर्श के प्रति समर्पित हैं,आधे से ज्यादा समस्या दूर हो जाएगी। वस्तुताः जिनमे शिक्षक की गरिमा के अनुरूप आचरण ना हो ,जो अपने पेशे के प्रति न्याय नहीं कर पाए उन्हें तो इस पेशे में रहने का कोई अधिकार भी नहीं है और शासन सत्ता को भी चाहिए की उन्हें ढूंढ ढूंढ कर बाहर निकाले।ऐसे सच्चरित्र और गुणवान व्यक्तियों को ही शिक्षकीय पेशे के रूप में शिक्षकभर्ती करना चाहिए।जो पूर्णतः इस पेशे के प्रति समर्पित हो,उत्साही हों नवाचारी हों। आज सरकारी तंत्र में शिक्षा व्यवस्था की दुर्गति है ,प्राथमिक शिक्षा के विषय में ज्यादा ना ही कहा जाए तो बेहतर होगा।समाज और सरकारों द्वारा शिक्षकों को बार-बार कोसना की वे कामचोर हैं,उचित नहीं है। शिक्षक एक मिश्रित हैसियत वाला व्यक्ति है, सरकारों ने यह साजिश रची है कि इस पेशे में सबसे ज्यादा शिक्षक को बदनाम कर दो तो सरकारी तंत्र की शिक्षा व्यवस्था ही पूरी तरह से बदनाम हो जाएगी, और जब आमजन सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को प्रवेश ही न दिलाएंगे तो धीरे-धीरे सरकारी तंत्र सरकारी शिक्षा व्यवस्था धराशाई हो जाएगी। शिक्षा पर सरकारों को खर्च पूरी तरह से अनुत्पादक, निरर्थक लगता है ।अगर सरकार शराब की दुकानें खोलती है तो सरकारों को लगता है कि इससे राजस्व मिलेगा लेकिन शिक्षा पर खर्च करना सरकारों को लगता है कि बेवजह खर्चा है।सच यही है।कुल मिलाकर अगर सरकारी शिक्षा व्यवस्था को सुधारना है तो सरकारों को एक तो शिक्षक के चुनाव में बड़ी सतर्कता बरतनी चाहिए उन्हीं योग एवं होनहार तथा उच्च चरित्र वाले व्यक्तियों का शिक्षक के रूप में चयन किया जाना चाहिए जो वास्तव में इस पेशे के प्रति न्याय कर सकें, जो कक्षा में जाकर विद्यार्थियों के बीच जाकर उन्हें पढ़ाने में रुचि लेते हो ,विद्यार्थियों को पढ़ा कर बाहर निकल कर आने में जिन्हें वास्तविक आत्म संतुष्टि मिलती हो ,तथा जिन्हें बच्चों के भविष्य गढ़ने में रुचि हो ,जो बच्चों के आदर्श बन सके और बच्चों को अपना पर्याप्त समय दे सके।क्योंकि आज भी बच्चे सबसे ज्यादा अनुकरण अपने शिक्षकों का ही करते हैं, उनकी बोली ,उनकी भाषा, उनके पहनावे ,उनके आचरण का। दूसरी बात है कि सरकारों को शिक्षकों पर तनाव बिल्कुल नहीं रखना चाहिए शिक्षकों को पठन-पाठन का पर्याप्त अवसर देना चाहिएगैर शिक्षकीय कार्यों से पूर्णतः शिक्षको को प्रथक किया जाना चाहिए। उनके खुद के ज्ञान वर्धन के लिए उनकी गुणवत्ता के लिए ऐसे कार्यक्रम और ट्रेनिंग प्रोग्राम आयोजित होने चाहिए जिससे वे अपने ज्ञान को परिमार्जित कर सके और वृद्धि कर सकें और बाकी चीजें तो गौण हो जाती हैं उनके ऊपर तो निश्चित रूप से सरकारें खर्चा कर ही रही हैं (जैसे भौतिक संसाधन और विद्यार्थियों को कक्षा तक लाने के लिए आकर्षक योजनाएं।)अगर शिक्षक को राष्ट्र निर्माता का दर्जा दिया गया है तो इस कथनी को सरकारों को निभाना चाहिए उसे करनी में बदलना चाहिए राष्ट्र निर्माता के पद में गलत व्यक्तियों का चुनाव ना हो और राष्ट्र निर्माताओं के कंधे पर बच्चो के भविष्य का भार डाला जाए तो उन्हें पर्याप्त स्वतंत्रता भी दी जाए उन्हें सुख सुविधाएं दिए जाएं और उन्हें अच्छा वातावरण पठन-पाठन का दिया जाए ।नहीं तो यह सलाह नहीं चेतावनी है कि आगे आने वाले समय में अच्छे शिक्षकों का मिलना कठिन ही नहीं बल्कि मुश्किल हो जाएगा अच्छे युवा इस व्यवसाय के प्रति अनिक्षुक हो जाएंगे और वह हरगिज शिक्षकीय पेशे को नहीं अपनाएंगे। शिक्षकों का जितना अनादर होगा( जो अक्सर प्रसासनिक तंत्र में दिखाई देता है।) सरकारी शिक्षा व्यवस्था उतनी ही गर्त में जाएगी इस दिशा में सरकारों को भी और शिक्षकों को भी दोनों को ही बहुत ज्यादा चिंतन मनन की आवश्यकता है। शिक्षकों को राष्ट्र निर्माता की पदवी दी गई है तो यह शिक्षकों का भी परम कर्तव्य है कि वह उसे जी कर दिखाएं और सरकारों का भी यह परम कर्तव्य है कि उन्हें ऐसा बनाएं इस व्यवसाय को आकर्षक बनाएं इस पेशे को इतना अच्छा ,सुंदर बनाएं कि हमारे युवा इस पेशे के प्रति आकर्षित हो।

द्वारा: डॉ रामानुज पाठक

सतना मध्य प्रदेश

7974246591 , 7697179890.